वेदव्यास और आदिगुरु की परंपरा से जुड़ा है यह पर्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था. उन्होंने वेदों को व्यवस्थित स्वरूप दिया, महाभारत की रचना की और कई पुराणों का संकलन किया. भारतीय ज्ञान परंपरा में उनके योगदान के कारण उन्हें आदिगुरु माना जाता है. यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. वहीं सनातन परंपरा में भगवान शिव को भी प्रथम गुरु माना गया है, जिन्होंने सप्तऋषियों को योग और आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया था.
भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान क्यों है विशेष
भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का पथप्रदर्शक माना गया है. मान्यता है कि गुरु व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं. यही वजह है कि शास्त्रों में गुरु को अत्यंत पूजनीय स्थान दिया गया है. गुरु पूर्णिमा का पर्व हर उस व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने का संदेश देता है, जिसने जीवन में शिक्षा, संस्कार और प्रेरणा देने का कार्य किया है.
ऐसे करें गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजन
गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं. इसके बाद पूजा स्थल पर गुरु, महर्षि वेदव्यास या उनके चित्र की स्थापना कर दीप, चंदन, अक्षत, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं. श्रद्धा के साथ पूजा करने के बाद गुरु से ज्ञान, सद्बुद्धि और जीवन में सही मार्गदर्शन का आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा है. यह पर्व आत्मचिंतन, सीखने की भावना और गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश भी देता है.