Jharkhand High Court: पूर्वी सिंहभूम के जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने दायर रिट याचिका खारिज कर दी है. अदालत ने एसएआर अधिकारियों के पुराने आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने माना कि मामले में पहले दिए गए आदेशों को गलत ठहराने का आधार नहीं बनता.
CNT Act के उल्लंघन पर कोर्ट की टिप्पणी
मामला आदिवासी जमीन से जुड़ा था. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने CNT Act के प्रावधानों को लेकर अहम टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि अगर CNT Act के नियमों को तोड़कर आदिवासी जमीन पर कब्जा किया गया है, तो केवल आपसी समझौते या कोर्ट की डिक्री के आधार पर उस कब्जे को वैध नहीं माना जा सकता.
गौर डांगा मौजा की जमीन का मामला
यह विवाद पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) के एमजीएम थाना क्षेत्र स्थित गौर डांगा मौजा की जमीन से जुड़ा है. अनंता गौर उर्फ अनंत कुमार प्रधान और ईशान गौर उर्फ ईशान कुमार प्रधान ने भूमि सुधार उप समाहर्ता, धालभूम के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
2006 में शुरू हुई थी जमीन बहाली की कार्रवाई
मामले में वर्ष 2006 में CNT Act की धारा 71-A के तहत जमीन बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इसके बाद जमीन को ममता सिंह मुंडा के पक्ष में वापस करने का आदेश दिया गया. इस आदेश को चुनौती देते हुए एसएआर अपील और रिवीजन दाखिल किए गए थे. दोनों स्तरों पर याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली.
1967 से कब्जे का दिया था हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि वे वर्ष 1967 से जमीन पर कब्जे में हैं. उनका कहना था कि उसी वर्ष टाइटल सूट भी दाखिल किया गया था. बाद में मामले का समझौते के आधार पर निपटारा हुआ. याचिकाकर्ताओं ने इसी समझौते को जमीन पर अपने अधिकार का आधार बताया. उनका यह भी कहना था कि इसके बाद जमीन का म्यूटेशन उनके नाम किया गया और उनसे लगान भी लिया गया.
35 साल बाद कार्रवाई का तर्क भी नहीं माना
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने एक और दलील रखी. उन्होंने कहा कि जमीन बहाली से जुड़ा एसएआर मामला करीब 35 साल बाद शुरू किया गया. इसलिए उनके मुताबिक यह कार्रवाई तय समय-सीमा के बाहर थी. हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया. अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से रखे गए तर्कों में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं पाया. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी. मामले में जमीन बहाली को लेकर एसएआर अधिकारियों के पहले के आदेश बरकरार रहे.