चांडिल : चांडिल से होकर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया तक निर्माणाधीन वैकल्पिक मार्ग (एनएच-32 बाईपास) को लेकर इन दिनों यह सवाल उठता जा रहा है कि इसका श्रेय किसे दिया जाए? क्या यह केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री सह रांची सांसद संजय सेठ के प्रयासों का परिणाम है या केंद्र सरकार की बड़ी राष्ट्रीय परियोजनाओं का हिस्सा?
क्या संजय सेठ के प्रयास से हो रहा है निर्माण?
हाल के दिनों में निर्माण एजेंसी पर दबाव बनाकर घोड़ानेगी से पितकी तक का हिस्सा चालू भी करवा दिया गया है। रविवार शाम को शुभारंभ हुआ और सोमवार से भारी वाहनों का आवागमन प्रारंभ हो जाएगा, जिससे चांडिल बाजार के भीषण जाम से राहत मिली।परंतु, यहां सवाल यह है कि यदि संजय सेठ के प्रयास से वैकल्पिक मार्ग (बाईपास रोड़) का निर्माण हो रहा है तो पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में इसी मार्ग का हिस्सा किसके प्रयास से निर्माण हो रहा है? क्योंकि, संजय सेठ का संसदीय क्षेत्र झारखंड के आदारडीह (नीमडीह) - दांतिया (पश्चिम बंगाल) सीमा तक ही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल के हिस्से में निर्माणाधीन मार्ग का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए? इस वैकल्पिक मार्ग का विस्तार पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले तक है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2018 में ही भूमि अधिग्रहण और चौड़ीकरण का काम प्रारंभ हुआ था। इस परियोजना को भारत सरकार की "भारतमाला परियोजना" से जोड़ा जा सकता है, जिसके अंतर्गत देशभर में रेलवे फाटक, बाज़ार और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में वैकल्पिक मार्गों का निर्माण हो रहा है।

भारत के अन्य राज्यों के वरिष्ठ संवाददाताओं से बातचीत करने पर पता चला है कि चांडिल-पुरुलिया वैकल्पिक मार्ग की तरह पूरे भारत में ही इस तरह के वैकल्पिक मार्गों का निर्माण तेजी से किया जा रहा है, यह केंद्र सरकार की परियोजना है। इस परियोजना के तहत पूरे भारत में एक अभियान के तहत वैसे सभी छोटे-बड़े शहर, कस्बों, औद्योगिक क्षेत्र, बड़े ट्रैफिक जाम वाले सड़क-चौक के लिए वैकल्पिक मार्ग अथवा फ्लाईओवर निर्माण किए जा रहे हैं। वहीं, रेलवे फाटकों को मानवरहित बनाने के उद्देश्य से उनमें भी फ्लाईओवर निर्माण किए जा रहे हैं। इसके अलावा भारतमाला परियोजना कार्य प्रगति पर है, जो देश के सभी राज्यों को एक मार्ग पर जोड़ने का काम करेगी।
अधूरे हैं काम, अधूरी हैं उम्मीदें
हालांकि, पितकी, जामडीह तथा पश्चिम बंगाल के श्यामनगर स्थित रेलवे फाटक पर फ्लाईओवर निर्माण अबतक अधूरा है और कार्य की रफ्तार धीमी बनी हुई है। दिसंबर 2025 तक सभी फ्लाईओवर और बचे हुए हिस्से को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
श्रेय का सवाल, और एक नया सवाल
क्षण भर के लिए मान भी लें कि वास्तव में यह बाईपास सड़क निर्माण संजय सेठ के प्रयासों का प्रतिफल है, तो फिर सवाल यह उठता है कि क्या वह अपनी संसदीय क्षेत्र की अन्य गंभीर समस्याओं पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान दे रहे हैं?
टाटा-रांची टोल रोड, जो आए दिन दुर्घटनाओं और खराब सड़कों के कारण चर्चा में रहती है, उसकी दुर्दशा को दूर करने के लिए कोई निर्णायक पहल अब तक क्यों नहीं हुई? चांडिल थाना क्षेत्र के चिलगु स्थित पुल, जो पिछले 10 महीनों से बंद पड़ा है और जिसके कारण तीन दर्जन से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हो चुके हैं, उसका निर्माण कार्य अबतक शुरू क्यों नहीं हुआ? एनएचएआई द्वारा बनाए गए वनवे मार्ग ने चिलगु-शहरबेड़ा में आवागमन को अत्यंत जोखिमपूर्ण बना दिया है। जो दुर्घटनाएँ हुई हैं, उनमें से अधिकांश पीड़ित रांची संसदीय क्षेत्र के ही हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब संजय सेठ चांडिल-पुरुलिया राष्ट्रीय राजमार्ग वैकल्पिक मार्ग निर्माण में भूमिका निभा सकते हैं, तो फिर अपने ही क्षेत्र की जमीनी समस्याओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दे रहे हैं?
जनता ही तय करे
चांडिल क्षेत्र में संजय सेठ की सक्रियता, मांग पत्र, निर्माण एजेंसी पर दबाव और उद्घाटन की पहलें निश्चित रूप से दर्ज की जा सकती हैं। लेकिन, जब पूरे मार्ग का निर्माण पहले से स्वीकृत केंद्र सरकार की परियोजना का हिस्सा है, और पश्चिम बंगाल की ओर भी निर्माण कार्य वर्षों पहले शुरू हो चुका था, तो इस परियोजना का श्रेय पूरी तरह से किसी एक व्यक्ति को देना जनता की विवेक पर निर्भर है।
चांडिल-पुरुलिया वैकल्पिक मार्ग निश्चित रूप से एक बड़ी और महत्वपूर्ण परियोजना है, जिससे ट्रैफिक जाम से राहत मिलेगी। लेकिन, इस चर्चा के साथ-साथ उन अन्य समस्याओं को भी उठाना जरूरी है, जो अब तक अनदेखी रही हैं। जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन किसी एक पहल से नहीं, बल्कि समग्र जिम्मेदारियों के निर्वहन से किया जाना चाहिए।