Government Of India: भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां सरकार की गलत विदेश नीति, पूंजीपतियों के लिए बनाई गई नीतियां और जनहित की अनदेखी देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रही हैं. अमेरिका का टैरिफ, अडानी समूह पर चल रही जांच और अंबानी के तेल सौदे इसके ताजे उदाहरण हैं.
अमेरिका का टैरिफ, मोदी सरकार की कूटनीतिक असफलता
अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया. इसके बाद कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया. इसका असर भारतीय निर्यात पर सीधा पड़ा है. कपड़ा, रत्न और आभूषण, समुद्री उत्पाद और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. इन उत्पादों की कीमतें अमेरिकी बाजार में बढ़ गईं, जिससे भारत की प्रतिस्पर्धा कम हो गई.
मोदी सरकार लगातार पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर हर समस्या को लेकर आरोप लगाती रहती है, लेकिन सच्चाई यह है कि आजादी के बाद पहली बार भारत पर इतनी भारी आर्थिक चोट विदेशी टैरिफ के रूप में लगी है. सवाल उठता है कि अगर नेहरू की नीति गलत थी, तो फिर आज मोदी सरकार की “दोस्ती वाली विदेश नीति” क्यों भारत को बचा नहीं पा रही?
रूस से तेल सौदे, मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस का मुनाफा, देश को घाटा
मोदी सरकार रूस से सस्ता तेल खरीदने की नीति को जनता के हित का बताती है, लेकिन असलियत कुछ और है. रिलायंस इंडस्ट्रीज, जो जामनगर में दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी चलाती है, रूस से सबसे बड़ा तेल खरीदार बन गई है.
जनवरी 2025 में रिलायंस ने रूसी कंपनी रॉसनेफ्ट के साथ 10 साल का समझौता किया, जिसके तहत वह रोजाना 5 लाख बैरल तेल खरीद सकती है. भारत के कुल रूसी तेल आयात का 35-40 फीसदी से अधिक हिस्सा रिलायंस खरीदती है. यह तेल परिष्कृत होकर डीजल और जेट ईंधन के रूप में यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में ऊंचे दामों पर बिकता है.
नतीजा यह हुआ कि अंबानी की कंपनी अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रही है, जबकि आम भारतीय उपभोक्ता को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई राहत नहीं मिलती. मोदी सरकार ने यह सौदा राष्ट्रीय हित बताकर पेश किया, लेकिन असल में यह पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की नीति है.
अडानी पर जांच, वैश्विक स्तर पर भारत की साख पर सवाल
अमेरिका का न्याय विभाग (DoJ) और सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) सितंबर 2025 तक अडानी समूह पर गंभीर आरोपों की जांच कर रहे हैं. आरोप है कि अडानी समूह ने 2020 से 2024 के बीच भारत में सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के ठेके लेने के लिए भारतीय अधिकारियों को 2,100 करोड़ रुपये से अधिक की रिश्वत दी.
साथ ही, अडानी समूह ने अमेरिकी निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाने के लिए भ्रष्टाचार-रोधी नीतियों पर झूठे बयान दिए. इतना ही नहीं, जांच में बाधा डालने के आरोप भी सामने आए हैं.
इस मामले में अमेरिकी एजेंसियां भारत के कानून मंत्रालय से सहयोग मांग रही हैं, लेकिन अगस्त 2025 तक कानूनी नोटिस जारी नहीं किए गए. यह देरी मोदी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाती है. क्या सरकार अडानी की ढाल बन रही है?
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
1. निर्यात में गिरावट - अमेरिकी टैरिफ के बाद भारतीय निर्यातकों को भारी झटका लगा है.
2. तेल सौदों से आम जनता वंचित - अंबानी का मुनाफा बढ़ा, लेकिन जनता को सस्ता तेल नहीं मिला.
3. निवेशकों का भरोसा टूटा - अडानी पर अंतरराष्ट्रीय जांच से भारतीय कंपनियों की साख पर असर पड़ा है. नवंबर 2024 में अडानी समूह को 600 मिलियन डॉलर का बॉन्ड जारी करने की योजना रद्द करनी पड़ी.
4. रोजगार पर असर - निर्यात प्रभावित होने से कपड़ा और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों में नौकरियों पर खतरा है.
मोदी सरकार की नीतियों ने बढ़ाया संकट
मोदी सरकार बार-बार नेहरू को दोष देती है, लेकिन आज की हकीकत यह है कि मोदी सरकार की नीतियों ने भारत को अमेरिका जैसे सहयोगी देशों के टैरिफ झेलने पर मजबूर कर दिया, अंबानी और अडानी जैसे पूंजीपतियों को मुनाफा पहुंचाया, और भारतीय जनता को महंगाई और बेरोजगारी के संकट में धकेल दिया.
भारत की अर्थव्यवस्था पर यह तीन तरफा हमला हैं, अमेरिकी टैरिफ, अडानी पर जांच और अंबानी का तेल मुनाफा. मोदी सरकार की पूंजीपति-परस्त नीतियों का नतीजा है. यह वही सरकार है जो हर समस्या पर नेहरू का नाम लेकर बच निकलने की कोशिश करती है, लेकिन असलियत यह है कि उसकी अपनी नीतियों ने भारत की साख, अर्थव्यवस्था और जनता, तीनों को नुकसान पहुंचाया है.