Right To Information: आरटीआई कानून को लागू हुए दो दशक पूरे हो चुके हैं, लेकिन गुजरात में पारदर्शिता की हालत चिंताजनक है. सक्रिय खुलासों (Proactive Disclosures) की स्थिति बेहद कमजोर है और सूचना न देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई लगभग नाम मात्र की रही है.
एक हालिया ऑडिट (2025) जिसमें 26 विभागों की जांच की गई, ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे. सिर्फ 35% विभागों ने अपनी वेबसाइटों पर जानकारी अपडेट की थी. 38% विभाग पुरानी जानकारी दिखा रहे थे, जबकि 8% विभागों की वेबसाइटें पूरी तरह निष्क्रिय पाई गईं.
मिडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गुजरात में अब तक 2.1 लाख से अधिक आरटीआई आवेदन दायर किए गए, जिनमें सबसे अधिक आवेदन शिक्षा, गृह और राजस्व विभागों में पहुंचे, कुल आवेदनों का 58%. यह दर्शाता है कि प्रशासनिक शक्ति इन विभागों में सबसे अधिक केंद्रित है.
सूचना आयोग की संरचना भी सवालों के घेरे में है. गुजरात राज्य सूचना आयोग (GSIC) ने मई 2005 से अब तक 1.37 लाख अपीलों और शिकायतों का निपटारा किया है, 1,248 मामले लंबित हैं. लेकिन अब तक एक भी पत्रकार या सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि को सूचना आयुक्त नहीं बनाया गया, जिससे पूरा तंत्र नौकरशाही-प्रधान बना हुआ है.
दंडात्मक कार्रवाई की स्थिति भी बेहद कमजोर है. 20 वर्षों में सिर्फ 1,284 जनसूचना अधिकारियों (PIOs) पर 1.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया, जो कुल मामलों का 1% भी नहीं है. मात्र 74 अधिकारियों पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई, जिससे यह संदेश गया कि जानकारी छुपाने पर भी कोई गंभीर परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा.
डिजिटल पारदर्शिता भी नाकाम साबित हुई है. कई विभाग, विशेषकर शहरी विकास और विधि विभाग, आज भी दस साल पुरानी फाइलों पर निर्भर हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने नियमित अपडेट का स्पष्ट निर्देश दिया था.
आरटीआई कानून की 20वीं वर्षगांठ पर गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने कहा कि पारदर्शिता की लड़ाई लड़ने वाले कई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है या वे धमकियों का सामना कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट आज तक लागू नहीं किया गया. इस कानून का उद्देश्य भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को सुरक्षा देना था, लेकिन सरकार की उदासीनता के कारण यह सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है. लोग अब आरटीआई का इस्तेमाल करने से डरते हैं.”
गुजरात का यह हाल उस राज्य की तस्वीर दिखाता है, जहां सूचना का अधिकार तो है, लेकिन जवाबदेही अब भी अंधेरे में है.