National News: कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों को सीमित करने के लिए सख्त कदम उठाने का निर्णय लिया है. गुरुवार को हुई मंत्रिमंडल बैठक में तय किया गया कि सार्वजनिक स्थानों, सरकारी परिसरों, सड़कों और स्कूलों में बिना अनुमति किसी भी संगठन द्वारा पथ संचलन या शाखा गतिविधि आयोजित नहीं की जा सकेगी. सरकार ने स्पष्ट किया है कि नए नियम दो से तीन दिनों में लागू कर दिए जाएंगे और इनके उल्लंघन पर कार्रवाई की जाएगी.
सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी संगठनों को किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा. इस निर्णय का सीधा असर विशेष रूप से RSS की शाखाओं और पथ संचलन पर पड़ेगा, जिन्हें अक्सर स्कूल मैदानों और सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किया जाता है.
इस फैसले से राजनीतिक विवाद तेज हो गया है. भाजपा नेताओं ने इसे आरएसएस के खिलाफ राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए सरकार की घोषणा को मानने से इनकार कर दिया. भाजपा का कहना है कि RSS कोई राजनीतिक संगठन नहीं बल्कि सांस्कृतिक संगठन है और उसके कार्यक्रम पूर्व की भांति जारी रहेंगे.
आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे, जिन्होंने पहले मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर RSS की गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की थी, उसी ने भाजपा को चेतावनी दी है कि नियमों का पालन नहीं करने वालों पर कानूनी कार्रवाई होगी. खड़गे ने आरोप लगाया था कि RSS द्वारा सरकारी और अनुदानित स्कूलों सहित सार्वजनिक मैदानों में शाखाएं चलाकर बच्चों और युवाओं के बीच नकारात्मक विचार फैलाए जा रहे हैं.
विवाद के बीच एक पुराना सरकारी दस्तावेज भी सामने आया है. सिद्धारमैया सरकार ने वर्ष 2013 का वह सर्कुलर फिर से जारी किया है जो तत्कालीन भाजपा सरकार ने लागू किया था. उस सर्कुलर में कहा गया था कि स्कूलों और उनके खेल मैदानों का उपयोग केवल शैक्षणिक उद्देश्य के लिए ही किया जा सकता है.
इस विषय पर कर्नाटक विधान परिषद में विपक्ष के नेता नारायणस्वामी ने कहा कि प्रियांक खड़गे हमेशा से RSS विरोधी रहे हैं. उन्होंने कहा कि लोग आरएसएस से इसलिए जुड़ते हैं क्योंकि यह भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य करता है. नारायणस्वामी ने RSS को देशभक्त संगठन बताते हुए सरकार के फैसले को विचारधारात्मक हमला करार दिया.
विवाद तब और बढ़ गया जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पुत्र यतींद्र सिद्धारमैया ने RSS की तुलना तालिबान जैसी मानसिकता से की और कहा कि ऐसे संगठनों को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए. मुख्यमंत्री स्वयं भी पहले कह चुके हैं कि RSS सरकारी परिसरों में अनुचित तरीके से शाखाएं लगा रहा है.
कर्नाटक सरकार का यह कदम केवल प्रशासनिक आदेश भर नहीं बल्कि एक वैचारिक लड़ाई का संकेत है. जहां सरकार इसे सार्वजनिक संस्थानों की निष्पक्षता बनाए रखने का प्रयास बता रही है, वहीं भाजपा और RSS इसे उनकी विचारधारा पर सीधा हमला मान रहे हैं. दिलचस्प है कि सरकार ने उसी 2013 सर्कुलर का हवाला दिया है जिसे भाजपा शासनकाल में जारी किया गया था, जिससे राजनीतिक तर्क और जटिल होते हैं. आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़कों से लेकर विधानसभाओं तक गर्म रहेगा. यह विवाद केवल शाखाओं पर नहीं, बल्कि देश में सार्वजनिक संस्थानों की तटस्थता बनाम वैचारिक हस्तक्षेप की बहस में बदल सकता है.