Bihar Elections: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने उम्मीदवारों के चयन में एक बार फिर सवर्ण समुदाय पर अपना भरोसा जताया है. आंकड़े बताते हैं कि एनडीए के हर तीसरे प्रत्याशी का संबंध ऊंची जाति हिंदू समुदाय से है. जबकि बिहार की जनसंख्या में इस वर्ग की हिस्सेदारी केवल 15 प्रतिशत के आसपास है.
भाजपा से 49 प्रतिशत टिकट ऊंची जाति को
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, एनडीए के भीतर सबसे बड़ा घटक दल भारतीय जनता पार्टी ने कुल उम्मीदवारों में से 49 प्रतिशत टिकट ऊंची जाति के प्रत्याशियों को दिए हैं. इनमें 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण और 1 कायस्थ प्रत्याशी शामिल हैं. भाजपा ने पिछड़े वर्ग के 30 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 12 प्रतिशत उम्मीदवारों को मौका दिया है.
जदयू से 4 मुस्लिम उम्मीदवार
वहीं नीतीश कुमार की जदयू ने पिछड़े वर्गों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व दिया है, लेकिन ऊंची जातियों की हिस्सेदारी अब भी बड़ी है. जदयू के 101 प्रत्याशियों में 37 ओबीसी (36 प्रतिशत), 22 अति पिछड़ा वर्ग (22 प्रतिशत), 22 ऊंची जाति (22 प्रतिशत), 15 अनुसूचित जाति (15 प्रतिशत), 1 अनुसूचित जनजाति और 4 मुस्लिम उम्मीदवार हैं.
एलजेपी-आर के अधिकतर उम्मीदवार राजपूत और यादव
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अपने उम्मीदवारों में 60 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदुओं को टिकट दिया है जबकि 40 प्रतिशत टिकट एससी और एसटी वर्ग के प्रत्याशियों को मिले हैं. पार्टी सूत्रों के अनुसार, एलजेपी-आर के अधिकतर उम्मीदवार राजपूत और यादव समुदाय से हैं, जिनकी संख्या पांच-पांच है. इसके अलावा 4 पासवान, 4 भूमिहार, एक-एक ब्राह्मण, तेली, पासी, सुधी, रौनियार, कानू, राजवार, धोही, कुशवाहा, रविदास और मुस्लिम समुदाय से उम्मीदवार बनाए गए हैं.
जीतनराम मांझी ने 2 भूमिहार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा
जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) ने 6 सीटों में से 4 मांझी के रिश्तेदारों और 2 भूमिहार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. वहीं उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने 1 भूमिहार, 1 राजपूत, 3 कुशवाहा और 1 वैश्य उम्मीदवार को टिकट दिया है.
एनडीए में 35 प्रतिशत सवर्ण उम्मीदवार
एनडीए के समग्र आंकड़ों को देखें तो कुल उम्मीदवारों में 35 प्रतिशत सवर्ण, 32 प्रतिशत ओबीसी, 15 प्रतिशत ईबीसी और शेष अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग से हैं. यह आंकड़ा बिहार की सामाजिक संरचना से बिल्कुल उलट है, जहां सवर्णों की 15 पंद्रह प्रतिशत, ईबीसी की 36 प्रतिशत, ओबीसी की 27 प्रतिशत और एससी की 19 प्रतिशत है. यानी कुल आबादी में सवर्णों की हिस्सेदारी कम होते हुए भी उन्हें टिकट का सबसे बड़ा हिस्सा मिला है.
महागठबंधन ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर जताया भरोसा
वहीं महागठबंधन ने अपने प्रत्याशियों के चयन में पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर ज्यादा भरोसा जताया है. पहले चरण में महागठबंधन ने 121 सीटों पर से 60 सीटों पर पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी उतारे हैं, जो कुल का लगभग 49 प्रतिशत है. इन 60 में 34 यादव उम्मीदवार हैं, जो अकेले ही पहले चरण में कुल उम्मीदवारों का 28 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं. वाम दलों ने 3 यादव उम्मीदवार, कांग्रेस ने 2 और सीपीआई ने 1 यादव प्रत्याशी मैदान में उतारा है.
महागठबंधन ने मुस्लिम समुदाय से भी 8 प्रत्याशियों को दिया टिकट
महागठबंधन ने मुस्लिम समुदाय से भी 8 प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जिसमें आरजेडी के 6, कांग्रेस के 1 और वाम दलों के 1 उम्मीदवार शामिल हैं. आरजेडी की ओर से जारी सूची में कुल 51 सीटों में से 34 यादव (66 प्रतिशत) और 6 मुस्लिम (12 प्रतिशत) उम्मीदवार हैं. कांग्रेस ने सवर्ण, दलित और मुस्लिम समुदायों पर भरोसा जताते हुए अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, वहीं पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों को भी कुछ हद तक प्रतिनिधित्व दिया है.
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण एक बार फिर निर्णायक भूमिका में हैं. एनडीए जहां सवर्ण समुदाय पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं महागठबंधन पिछड़े वर्गों और मुस्लिम मतदाताओं पर दांव लगा रहा है. यह दोनों गठबंधन अपनी परंपरागत वोट बैंक की सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश तो कर रहे हैं, परंतु उम्मीदवारों के वितरण में वही पुराना जातीय समीकरण दोहराया गया है. एनडीए की सूची दिखाती है कि सत्ता की राजनीति अब भी सामाजिक समानता के विचार से बहुत दूर है. वहीं आरजेडी और उसके सहयोगी पिछड़ों के भरोसे सत्ता वापसी की उम्मीद लगाए हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का सवाल अभी भी अधूरा है, और जातीय पहचान अब भी चुनावी टिकट से लेकर वोट तक का सबसे बड़ा निर्धारक बनी हुई है.