Jharkhand Big News: झारखंड के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने में हो रही लगातार देरी पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने इस मामले में झारखंड सरकार के गृह, जेल एवं आपदा प्रबंधन विभाग की प्रधान सचिव को व्यक्तिगत रूप से शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है. इस शपथ पत्र में राज्य के सभी थानों में कैमरे लगाने की निश्चित समयसीमा बतानी होगी.
यह मामला कोर्ट के स्वतः संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें राज्य के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने को लेकर आदेश जारी किया गया था. मंगलवार को इस याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान कर रहे थे, ने सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब पर असंतोष जताया. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार इस गंभीर मामले में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं दिखा सकी है.
मामले में पहले राज्य की ओर से वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा एक प्रति-शपथ पत्र दाखिल किया गया था, जिसमें बताया गया था कि 16 अप्रैल 2024 को जेप-आईटी के माध्यम से राज्य भर के पुलिस थानों में कुल 334 सीसीटीवी कैमरे लगाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था. लेकिन अदालत ने इसे अपर्याप्त बताते हुए कहा कि केवल प्रस्ताव का जिक्र करना पर्याप्त नहीं है, जब तक यह न बताया जाए कि वास्तव में अब तक क्या कार्रवाई हुई है. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि उस तिथि से अब तक डेढ़ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, फिर भी सरकार ने कोई ठोस रिपोर्ट या कैमरे लगाने की प्रगति नहीं बताई.
अब अदालत ने गृह विभाग की प्रधान सचिव से स्पष्ट निर्देश में कहा है कि वे व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करें, जिसमें राज्य के सभी थानों में कैमरे लगाने की सटीक समय-सीमा और अब तक की प्रगति का विस्तृत ब्यौरा शामिल हो. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 14 नवंबर तय की है.
झारखंड के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का मामला सिर्फ तकनीकी सुविधा का नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही का प्रश्न है. पुलिस थानों में कैमरे लगने से न केवल हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा होती है, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता भी बढ़ती है.
हाईकोर्ट का यह सख्त रुख राज्य सरकार की उस सुस्त प्रशासनिक प्रणाली पर चोट करता है, जो बार-बार प्रस्ताव बनाकर फाइलें आगे बढ़ाने में तो सक्रिय है, पर जमीनी स्तर पर काम पूरा करने में नाकाम रहती है. सीसीटीवी कैमरे न लगने की वजह से हिरासत में हिंसा, उत्पीड़न और सबूत नष्ट होने जैसे गंभीर मामले अब भी सामने आते हैं.
सरकार के पास अब विकल्प सीमित हैं, या तो वह तत्काल कार्यवाही कर कोर्ट को संतुष्ट करे, या यह स्वीकार करे कि कानून व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर है. अदालत का रुख यह साफ संकेत देता है कि न्यायपालिका अब इस लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगी और जवाबदेही तय किए बिना मामला खत्म नहीं होने वाला.