Bihar Elections: बिहार की सियासत एक बार फिर नई करवट ले चुकी है. महागठबंधन ने इस बार अपने पत्ते बेहद सोच-समझकर खोले हैं. तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के साथ ही विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया गया है. गुरुवार को पटना में आयोजित महागठबंधन की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह घोषणा की. इस घोषणा ने बिहार की चुनावी हवा में अचानक गर्मी पैदा कर दी है.
तीन साल से इंतजार कर रहे थे सहनी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव के साथ मौजूद मुकेश सहनी ने साफ कहा कि वे इस दिन का तीन साल से इंतजार कर रहे थे. उन्होंने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा ने उनकी पार्टी को तोड़ा, उनके विधायकों को खरीदा और उन्हें कमजोर करने की कोशिश की. लेकिन अब उन्होंने प्रण लिया है कि जब तक भाजपा को तोड़ नहीं देंगे, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे. सहनी ने कहा कि उन्होंने गंगाजल लेकर शपथ ली थी और अब वह वादा निभाने का वक्त आ गया है.
बिहार में सिर्फ कुछ परिवार नहीं बल्कि हर वर्ग की भागीदारी होगी
उन्होंने कहा कि बिहार की राजनीति में लंबे समय से अति पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व दबा हुआ था और अब समय आ गया है जब इस वर्ग को उसका हक मिलना चाहिए. महागठबंधन की ओर से हमें उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर यह साबित कर दिया गया है कि अब बिहार में सिर्फ कुछ परिवार नहीं बल्कि हर वर्ग की भागीदारी होगी.
भाजपा सहयोगी दलों का करती हैं इस्तेमाल
मुकेश सहनी का कहना था कि भाजपा सहयोगी दलों का इस्तेमाल करती है और जब काम निकल जाता है तो उन्हें निगल जाती है. उन्होंने कहा कि हम भाजपा के साथ रहकर यह बात समझ चुके हैं और अब पूरी मजबूती से महागठबंधन के साथ हैं. बिहार में हम 60 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने दावा किया कि बिहार की 37 प्रतिशत आबादी अति पिछड़े समुदाय की है और अब समय आ गया है कि अति पिछड़ों का बेटा बिहार का उपमुख्यमंत्री बने.
मल्लाह समुदाय कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक
दरअसल, महागठबंधन ने मुकेश सहनी को यह अहम जिम्मेदारी सौंपकर सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक पूरी जाति और वर्ग को साधने की कोशिश की है. मल्लाह समुदाय, जिससे मुकेश सहनी आते हैं, बिहार के गंगा किनारे फैले जिलों में बड़ी संख्या में है और इनका प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक है. यही वजह है कि उन्हें उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर महागठबंधन ने भाजपा और एनडीए को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया है.
तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी का साथ होना जातीय समीकरणों के लिहाज से बेहद मजबूत
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी का यह संयोजन जातीय समीकरणों के लिहाज से बेहद मजबूत है. तेजस्वी जहां यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रभाव रखते हैं, वहीं सहनी का मल्लाह समुदाय और अति पिछड़े वर्गों में गहरा असर है. यह जोड़ी भाजपा की उस रणनीति को सीधे चुनौती देती दिख रही है, जिसमें एनडीए ने सवर्ण समाज से सबसे ज्यादा उम्मीदवार उतारे हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि बिहार के ईबीसी (अति पिछड़े वर्ग) मतदाता लंबे समय से राजनीतिक पहचान की तलाश में हैं. ऐसे में महागठबंधन ने उन्हें सीधा नेतृत्व देने का ऐलान कर एनडीए के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
कौन है मुकेश सहनी
मुकेश सहनी के जीवन की कहानी भी बिहार के आम मछुआरे समुदाय के संघर्ष को बयां करती है. 1981 में दरभंगा के एक मछुआरे परिवार में जन्मे सहनी ने किशोरावस्था में ही संघर्षों से लड़ने की आदत डाल ली थी. महज 19 साल की उम्र में उन्होंने बिहार छोड़ मुंबई का रुख किया और वहां एक सेल्समैन के रूप में काम शुरू किया. बाद में उन्होंने बॉलीवुड में सेट डिजाइनर के रूप में पहचान बनाई.
उन्होंने “देवदास” और “बजरंगी भाईजान” जैसी फिल्मों के सेट डिजाइन किए और मुंबई में “मुकेश सिने वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड” नाम की कंपनी स्थापित की. लेकिन उनके भीतर का समाजसेवी और राजनीतिक सोच उन्हें बिहार खींच लाई. उन्होंने निषाद समुदाय के अधिकारों के लिए “निषाद विकास संघ” की स्थापना की और 2018 में “विकासशील इंसान पार्टी” (वीआईपी) का गठन किया.
सहनी का राजनीतिक सफर भाजपा से शुरू हुआ था. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा के स्टार प्रचारक रहे. उस समय के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उन्हें अपने साथ मंच साझा करवाते थे. लेकिन भाजपा से सहनी का मोह तब टूटा जब उन्हें लगा कि भाजपा ने निषाद समुदाय से आरक्षण के वादे को पूरा नहीं किया.
इसके बाद सहनी ने नीतीश कुमार के साथ भी तालमेल किया लेकिन कुछ ही समय में यह रिश्ता भी टूट गया. सहनी ने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार ने भी उनके समुदाय से किए वादे पूरे नहीं किए. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वीआईपी ने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और चार सीटों पर जीत दर्ज की. हालांकि सहनी खुद चुनाव हार गए लेकिन नीतीश सरकार में उन्हें पशुपालन मंत्री बनाया गया.
बाद में उनके विधायकों के भाजपा में चले जाने के बाद राजनीतिक समीकरण फिर बदल गए. सहनी ने भाजपा से नाराज होकर उत्तर प्रदेश में 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, जिससे भाजपा और वीआईपी के रिश्ते टूट गए. कुछ समय बाद नीतीश सरकार से भी उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद सहनी ने अप्रैल 2024 में फिर से महागठबंधन का दामन थाम लिया.
अब जब महागठबंधन ने उन्हें उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, तो यह न केवल एक राजनीतिक रणनीति है बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की दिशा में भी बड़ा कदम है.
बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों के बिना अधूरी है और महागठबंधन ने इस बार इसे पूरी तरह साधने की कोशिश की है. तेजस्वी यादव का युवा और ऊर्जावान नेतृत्व यादव-मुस्लिम समीकरण को मजबूती देता है, वहीं मुकेश सहनी की छवि अति पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में महागठबंधन को सामाजिक संतुलन प्रदान करती है. भाजपा जहां सवर्ण और ऊपरी जाति के वोटरों पर निर्भर दिख रही है, वहीं महागठबंधन ने अपने पत्ते सामाजिक न्याय के नाम पर खोले हैं.
सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर महागठबंधन ने भाजपा और जेडीयू दोनों के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है. यह कदम चुनावी रणनीति के लिहाज से उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से. यह देखना दिलचस्प होगा कि मल्लाह और अति पिछड़ा वर्ग इस नए समीकरण को कितना स्वीकार करता है, लेकिन इतना तय है कि बिहार की सियासत अब और दिलचस्प होने वाली है.