Jharkhand News: पाकुड़ और दुमका में पैनम कोल माइंस के कथित अवैध खनन और विस्थापितों की अनदेखी के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने फिर सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. गुरुवार को चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान की बेंच ने दुमका डिविजनल कमिश्नर की जांच रिपोर्ट पर अब तक हुई कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा.
2015 में पैनम माइंस को दोनों जिलों में कोयला खदान का लीज मिला था लेकिन कंपनी पर आरोप है कि उसने तय सीमा से कई गुना ज्यादा खनन कर सरकार को सैकड़ों करोड़ का चूना लगाया. हजारों आदिवासी विस्थापितों का पुनर्वास भी नहीं हुआ. हाईकोर्ट के वकील राम सुभग सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर सीबीआई जांच और विस्थापितों के पुनर्वास की मांग की है.
कोर्ट ने पहले भी दुमका कमिश्नर की रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार से सवाल किए थे लेकिन हर बार कागजी जवाब ही मिले. इस बार बेंच ने साफ कहा कि सिर्फ शपथ पत्र से काम नहीं चलेगा. रिपोर्ट में जो गड़बड़ियां पकड़ी गईं उनके आधार पर ठोस कार्रवाई का हिसाब चाहिए.
पैनम कोल मामला झारखंड के खनन घपलों की पुरानी किताब का नया पन्ना है. दुमका कमिश्नर की रिपोर्ट में साफ अवैध खनन और राजस्व चोरी की बात कही गई थी लेकिन दस साल बीतने को हैं और कार्रवाई शून्य. हाईकोर्ट का बार बार टोका जाना बताता है कि जनहित याचिका ने सरकार की नींद उड़ा दी है. अगर कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दे दिया तो कई बड़े अफसर और राजनेताओं की शामत आ सकती है. विस्थापित आदिवासियों का सवाल भी जुड़ा है जिनकी जमीन गई लेकिन मुआवजा और रोजगार नहीं मिला. यह केस सिर्फ एक कंपनी का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की लूट का आईना है. अगली तारीख में सरकार अगर फिर खाली हाथ आई तो कोर्ट सख्त कदम उठा सकता है.