SIR In West Bengal: बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. निर्वाचन आयोग के निर्देश के बाद राज्य में यह कवायद शुरू हो चुकी है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस इस पर लगातार आपत्ति जता रही है. TMC नेताओं का आरोप है कि SIR को बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर बवाल खड़ा किया जा रहा है और इसके पीछे राजनीतिक मंशा छिपी है.
इस बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकने की मांग की है. ममता ने कहा है कि यह कार्यवाही न केवल अव्यवस्थित है बल्कि इसके कारण प्रशासनिक कर्मचारियों पर अमानवीय दबाव बनाया जा रहा है.
BLO पर दबाव और धमकी का आरोप
ममता बनर्जी ने तीन पन्नों के अपने पत्र में लिखा है कि बूथ लेवल अधिकारियों से घर-घर जाकर की जा रही जांच उनके सामर्थ्य से बाहर है. उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य निर्वाचन आयोग समयसीमा बढ़ाने या व्यवस्थागत सुधार करने के बजाय अधिकारियों को धमकियां दे रहा है. ममता के अनुसार इस तरह का रवैया चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना ही है तो इसे मानवीय ढंग से किया जाना चाहिए. कर्मचारियों को असहनीय दबाव में डालकर इस प्रक्रिया को लागू करना उचित नहीं है.
BLO ने की आत्महत्या
इसी बीच जलपाईगुड़ी के मालबाजार इलाके से एक दर्दनाक मामला सामने आया है. यहां बूथ लेवल ऑफिसर शांति मुनि उरांव का लटकता हुआ शव मिलने से हड़कंप मच गया. परिवार का आरोप है कि उन पर लगातार काम का दबाव बढ़ाया जा रहा था और मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. इस घटना ने SIR प्रक्रिया को लेकर उठ रहे प्रश्नों को और गंभीर बना दिया है.
चुनाव आयोग का रुख
आयोग के सूत्रों का कहना है कि BLO को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया है और वे निष्पक्ष तरीके से अपना काम कर रहे हैं. आयोग की ओर से अभी तक SIR प्रक्रिया रोकने के संकेत नहीं मिले हैं. अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी के पत्र पर आयोग आगे क्या निर्णय लेता है.
बंगाल में SIR को लेकर चल रहा विवाद साफ तौर पर प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक अविश्वास के टकराव को दिखाता है. एक ओर चुनाव आयोग मतदाता सूची को शुद्ध करने की कवायद को अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा मानता है, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार और TMC इसे राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रही है. BLO की आत्महत्या ने मुद्दे को संवेदनशील बना दिया है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिना पर्याप्त तैयारी और मानवीय दृष्टिकोण के इतनी व्यापक कवायद को लागू किया जाना चाहिए था. आने वाले दिनों में आयोग का निर्णय पश्चिम बंगाल के राजनीतिक माहौल पर सीधा असर डाल सकता है.