Delhi: सुप्रीम कोर्ट के शोध एवं योजना विंग (CRP) ने एक महत्वपूर्ण श्वेत पत्र जारी करते हुए देशभर के सभी सरकारी और निजी संस्थानों में काम करने वाली महिला और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए माहवारी अवकाश नीति बनाने और उसे लागू करने की सिफारिश की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह नीति बराबरी, सम्मान और मानवीय कार्य करने की स्थिति की संवैधानिक गारंटी पर आधारित होनी चाहिए, जिसमें माहवारी स्वास्थ्य को वर्कप्लेस पर कल्याण का अनिवार्य पहलू माना जाए।
गोपनीयता और सम्मान सुनिश्चित करने पर जोर
52वें सीजेआई रहे जस्टिस बीआर गवई की देखरेख में तैयार इस श्वेत पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि जिन कर्मचारियों को पीरियड्स होते हैं, उन्हें बिना किसी बदनामी, पेशागत या वित्तीय नुकसान के माहवारी अवकाश लेने के लिए एक सम्मानजनक और आसान तरीका बनाया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि माहवारी अवकाश को मौजूदा छुट्टी अवकाश नीति के फ्रेमवर्क में शामिल किया जा सकता है। यह कर्मचारियों को हर महीने एक तय संख्या में छुट्टी प्रदान करेगा, जिससे उनकी निजता और गोपनीयता बनी रहेगी। श्वेत पत्र में यह भी कहा गया है कि अवकाश लेने की प्रक्रिया में कर्मचारियों को अपनी जेंडर आइडेंटिटी या मेडिकल डिटेल्स बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जिसका आधार राष्ट्रीय विधिक सेवा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए स्वयं की पहचान करने के अधिकार का हवाला है।
कर्मचारियों की भलाई के लिए संस्थागत प्रतिबद्धता
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी संस्थानों को अपने कर्मचारियों की बराबरी, समावेशन सबको साथ लेकर चलने और पूरी तरह से उनकी भलाई के लिए अपनी संस्थागत प्रतिबद्धता के हिस्से के तौर पर एक व्यापक माहवारी अवकाश नीति बनानी चाहिए और उसे अपनाना चाहिए।
इस श्वेत पत्र का उद्देश्य माहवारी को स्वास्थ्य का एक जरूरी हिस्सा मानना है, जिसमें लड़कियां, ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी लोग भी शामिल हैं, जिनकी उम्र सामान्यतः 18 साल से 52 साल के बीच है डॉक्टर के प्रमाण पत्र पर 55 साल तक।
इन राज्यों और संस्थानों में पहले से है सुविधा
श्वेत पत्र में बताया गया है कि देश के छह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में छात्राओं को हर माह माहवारी की छुट्टी दी जाती है और उनकी जरूरी उपस्थिति के मानक को 70 फीसदी तक कम किया गया है। राज्यों की बात करें तो बिहार, केरल, कर्नाटक और ओडिशा में महिला कर्मचारियों को माहवारी अवकाश की सुविधा मिल रही है।
बिहार में हर माह दो दिन की छुट्टी दी जाती है।
कर्नाटक ने अक्टूबर 2025 में इसे लागू किया और सालाना 12 छुट्टी तय की है। सुप्रीम कोर्ट की यह सिफारिश देश के कार्यस्थलों में महिला और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सम्मान को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।