West Bengal Big News: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण कार्यक्रम SIR को लेकर हालात लगातार गरमाते जा रहे हैं. राज्य में सत्ताधारी दल के विरोध के बीच अब बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) भी सड़क पर उतर आए हैं. सोमवार को कोलकाता में बीएलओ ने निर्वाचन आयोग के कार्यालय का घेराव किया. स्थिति को काबू में रखने के लिए पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी. सवाल यह है कि आखिर SIR पर इतना विवाद क्यों खड़ा हो रहा है और इसके पीछे कौन से कारण हैं.
बड़ी संख्या में फर्जी या गैरकानूनी मतदाता हो सकते हैं बाहर
चुनाव आयोग की ओर से शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम को लेकर बंगाल में राजनीतिक टकराव की स्थिति बन गई है. विपक्ष का दावा है कि इसके पीछे कई कारण हैं. बंगाल में यह मुद्दा इसलिए ज्यादा उभरा है क्योंकि SIR से सियासी संतुलन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है. कहा जा रहा है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में फर्जी या गैरकानूनी मतदाता बाहर हो सकते हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि यह प्रक्रिया खास समुदायों को प्रभावित कर सकती है. बिहार में SIR के बाद लाखों नाम हटाए गए थे. विपक्ष के अनुसार उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी. इसके चलते बंगाल में डर बढ़ा है. बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मतदाता सत्यापन के बाद माइग्रेशन बढ़ा है. बीजेपी का दावा है कि इससे बड़ी संख्या में नकली वोटर हटेंगे.
TMC की वोट बैंक पर पड़ सकता है असर?
राज्य में सत्ताधारी दल को आशंका है कि यह प्रक्रिया उसके वोट बैंक पर सीधा असर डालेगी. आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में वोट हटने की स्थिति ने हमेशा चुनावी परिणामों को प्रभावित किया है. 2021 में बीजेपी को 38 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि टीएमसी 48 प्रतिशत वोट के साथ भारी बहुमत में रही थी. 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है. SIR से अगर बड़े पैमाने पर नाम हटते हैं तो इसका सीधा असर टीएमसी के सुरक्षित माने जाने वाले मुस्लिम बहुल इलाकों पर पड़ सकता है.
2002 में ममता ने किया था SIR का समर्थन
2002 में भी बंगाल में SIR लागू हुआ था. उस दौरान बड़ी संख्या में फर्जी मतदाता हटाए गए थे. बीजेपी नेताओं का कहना है कि तब ममता बनर्जी ने इस निर्णय का समर्थन किया था. लेकिन मौजूदा परिस्थिति अलग है. पिछले दो दशकों में बंगाल की जनसांख्यिकी और वोट समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है. सियासी गलियारों में यह माना जा रहा है कि इस बार SIR बीजेपी के लिए फायदा और टीएमसी के लिए नुकसान का कारण बन सकता है.
CAA को लेकर मतुआ समुदाय का बीजेपी की ओर झुकाव बढ़ा है. ऐसे में SIR के जरिए वैध मतुआ मतदाताओं को मजबूती और अवैध मतदाताओं के नाम हटने की संभावना से टीएमसी के लिए चुनौती बढ़ सकती है. सीमावर्ती जिलों में यह प्रभाव और ज्यादा गहरा हो सकता है.
बीएलओ के विरोध के पीछे भी अपना पक्ष है. विरोध कर रहे बीएलओ का कहना है कि कम समय में अत्यधिक काम का दबाव उन्हें मानसिक तनाव में डाल रहा है. कई राज्यों में इस प्रक्रिया के दौरान आत्महत्या के मामले आने के बाद आयोग ने समय सीमा बढ़ाई है.
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर मचा बवाल महज प्रशासनिक प्रक्रिया का विरोध नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर 2026 विधानसभा चुनाव से जुड़ा सियासी मुद्दा बन चुका है. सत्ताधारी दल को आशंका है कि बड़े पैमाने पर नाम हटने से उसके मजबूत वोट बैंक में सेंध लग सकती है. वहीं बीजेपी इसे अपने लिए बड़ा मौका मान रही है. बीएलओ का विरोध यह संकेत देता है कि जमीनी स्तर पर भी इस प्रक्रिया को लेकर दबाव बढ़ रहा है. आने वाले महीनों में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति के केंद्र में रहने वाला है.