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  • 2025-12-09

केबुल कंपनी अधिग्रहण विवाद - 25 साल की कानूनी लड़ाई का निराशाजनक अंत, स्वर्ण युग की कंपनी को 6% भुगतान, श्रमिकों के भविष्य पर संकट

Jharkhand: 30-35 देशों को निर्यात करने वाली और कभी पूरे एशिया महादेश में स्वयंभू एवं अति मुनाफेदार रही एक प्रमुख केबुल कंपनी की 25 साल लंबी और निराशाजनक कानूनी लड़ाई का अंत 3 दिसंबर 2025 को मेसर्स वेदान्ता लिमिटेड द्वारा कंपनी के अधिग्रहण के आदेश के साथ हो गया है। वर्ष 2000 से AAIFR, BIFR, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, NCLT (कोलकाता), और NCLAT (दिल्ली) जैसे विभिन्न न्यायालयों में चला यह विवाद अब कामगारों और कर्मचारियों के लिए अत्यधिक निराशाजनक परिणाम लाया है।

निराशाजनक समाधान और कर्मचारियों की चिंताएँ

कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों, यू. के. शर्मा (महामंत्री), कल्याण साही (कोषाध्यक्ष), और डॉ. बी. बी. महतो (अध्यक्ष) के अनुसार, NCLT-कोलकाता द्वारा दिए गए आदेश में कंपनी के 1,655 क्रेडिटर्स के कुल दावे (46,13,13,44,955.00 रुपये) में से मजदूरों/कर्मचारियों को मात्र 6% यानी 16,24,73,675.00 रुपये दिए जा रहे हैं।

यूनियन ने गंभीर चिंता व्यक्त की है कि इस समाधान में जहाँ एक ओर कामगारों को नगण्य राशि मिल रही है, वहीं "कुछ फर्जी दावेदारों" को कई गुना अधिक राशि देने का आश्वासन दिया गया है। यूनियन का आरोप है कि यह स्थिति पूँजीपतियों और फर्जी दावेदारों की साज़िशों के कारण उत्पन्न हुई है, जिसने कामगारों की आर्थिक लाभ की आशाओं को "अदत्य, अस्पष्ट एवं अंतहीन" बना दिया है।

 आवास और संपत्ति विवाद

कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता उनके आवास को लेकर है। यूनियन ने स्पष्ट किया है कि क्वार्टर/बंगला नहीं टूटेगा। पुटारा स्टील सबलीज का दावा करती आ रही है, जबकि कंपनी द्वारा बनाए गए मकान पर वेदान्ता दावा करने आ रहा है, जिससे मजदूरों के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।

 वित्तीय अनियमिताओं पर सवाल

पदाधिकारियों ने समाधान प्रक्रिया और कंपनी की वित्तीय रिपोर्टिंग पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, अंकेक्षण का अभाव: FBC ACT 2016 के अनुसार बिना अंकेक्षित बैलेंस शीट के देनदारियाँ (Liabilities) मान्य नहीं हैं, जबकि कंपनी की बैलेंस शीट वर्ष 2000 से ऑडिट नहीं कराई गई है।

माल और परिसंपत्ति: 31.03.2000 तक 4,53,66,069 रुपये के माल में से केवल 1,09,55,357.00 रुपये का माल बेचा गया, शेष 3,24,10,712 रुपये के माल का हिसाब नहीं है।बकाया राशि: 31.12.2000 तक 13,15,26,800.43 रुपये की बकाया सांविधिक देयताएँ Statutory Dues - PF, LIC, Gratuity, आदि आज 46 अरब रुपये से अधिक दिखाई जा रही हैं।

कंपनी की प्रमुख संपत्तियाँ - पुणे हादापसर, मोलगता, मुंबई सिनवर ओठ, गोरेगाँव, चेन्नई, दिल्ली, और आदित्यपुर जमशेदपुर में स्थित प्लांट/मशीनरी और भूमि - अब अधिग्रहणकर्ता के नियंत्रण में चली जाएंगी। कर्मचारी यूनियन ने इस समाधान को अस्वीकार करते हुए कानूनी लड़ाई जारी रखने और न्याय की माँग करने की बात कही है। यह अधिग्रहण भारत में कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया CIRP के तहत कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़ा करता है।
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