इस कार्रवाई की
सबसे बड़ी मार छोटे दुकानदारों और ठेला-खोमचा लगाने वालों पर पड़ी । पीड़ित दुकानदारों का आरोप है कि उन्हें न तो समय पर
कोई नोटिस दिया गया और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की गई। अचानक हुई तोड़फोड़ में लाखों रुपये का
सामान नष्ट हो गया और कई परिवारों की रोज़ी-रोटी एक
झटके में छिन गई।

स्थानीय
नागरिकों का कहना है कि यह अभियान न तो स्थायी समाधान है और न
ही विकास की कोई ठोस नीति। उनका आरोप है कि सरकार और प्रशासन सिर्फ़ राष्ट्रपति के
आगमन के दौरान “साफ-सुथरा शहर” दिखाने की कोशिश कर
रहे हैं, ताकि तस्वीरें
और वीडियो सोशल मीडिया—खासकर फेसबुक—पर साझा कर अपनी पीठ थपथपाई जा सके।
सबसे अहम सवाल ये
राष्ट्रपति के
लौटते ही क्या यही अतिक्रमण फिर से पहले की तरह खड़ा कर दिया जाएगा?
अगर ऐसा होता
है, तो यह अभियान
विकास नहीं, बल्कि सरकारी दिखावे
और अवसरवादी प्रशासन का प्रतीक बनकर रह जाएगा। आदित्यपुर
की जनता पूछ रही है कि जब अतिक्रमण वास्तव में समस्या है, तो सरकार साल भर क्यों चुप
रहती है?
कार्रवाई
सिर्फ़ वीआईपी दौरों से पहले ही क्यों होती है?
क्या आम
नागरिकों का रोज़गार और जीवन सिर्फ़ “इवेंट मैनेजमेंट” के लिए कुर्बान किया जाएगा?
शासन वही
सार्थक होता है जो निरंतर, न्यायसंगत और
मानवीय हो। लेकिन आदित्यपुर की यह कार्रवाई बताती है कि सरकार की
प्राथमिकता विकास नहीं, बल्कि दिखावा है। जब तक
सरकार अतिक्रमण पर स्थायी नीति, पुनर्वास की
व्यवस्था और न्यायपूर्ण प्रक्रिया नहीं अपनाती,
तब तक ऐसे
अभियान जनता की नज़र में सुशासन नहीं, बल्कि मजबूरी
में की गई कार्रवाई ही माने जाएंगे।
https://youtu.be/40X-6oa3E-Q?si=pGCKBmGPcUdsqapZ