Good News: भारत की भाषाई विविधता को नई पहचान देते हुए राष्ट्रपति भवन में एक ऐतिहासिक पहल देखने को मिली. देश का संविधान अब संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि के साथ उपलब्ध हो गया है. यह कदम न सिर्फ आदिवासी भाषाओं के सम्मान का प्रतीक बना है बल्कि संविधान को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है.
राष्ट्रपति भवन में ऐतिहासिक आयोजन
राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस गरिमामय समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन विशेष रूप से शामिल हुए. कार्यक्रम के दौरान संथाली भाषा में प्रकाशित संविधान का औपचारिक विमोचन किया गया, जिसे संथाली भाषी समाज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया.
संविधान की समझ मातृभाषा में
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि इस पहल से संथाली भाषा बोलने वाले लोग अब अपने अधिकारों और कर्तव्यों को अपनी मातृभाषा में समझ सकेंगे. उन्होंने कहा कि इससे संविधान के मूल्यों के प्रति जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना और मजबूत होगी.
ओल चिकी लिपि में संविधान
उपराष्ट्रपति के आधिकारिक एक्स हैंडल पर साझा जानकारी में बताया गया कि यह संविधान ओल चिकी लिपि में प्रकाशित किया गया है. पोस्ट में कहा गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के मार्गदर्शन में यह कार्य संभव हो सका है और यह पहल भाषाई समावेशन की दिशा में एक मजबूत कदम है.
राष्ट्रपति मुर्मू की भूमिका
उपराष्ट्रपति ने अपने वक्तव्य में यह भी याद किया कि जब द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थीं, तब उन्होंने आदिवासी कल्याण संस्कृति और भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की थीं. उन्होंने कहा कि यह विमोचन उसी विरासत का विस्तार है.
संथाली समुदाय के लिए गर्व का क्षण
इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ओल चिकी लिपि में संथाली भाषा में भारत के संविधान का प्रकाशन समस्त संथाली समाज के लिए गौरव और हर्ष का विषय है. इससे झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में रहने वाले संथाली लोग संविधान के अनुच्छेदों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे.
आठवीं अनुसूची में शामिल
संथाली भाषा को वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन के तहत संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था. यह भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में गिनी जाती है और बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय की मातृभाषा है.
भारत की विविध भाषाएं और संस्कृतियां शासन व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा
संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशन केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है बल्कि यह आदिवासी समाज को संवैधानिक अधिकारों से सीधे जोड़ने की दिशा में एक ठोस पहल है. मातृभाषा में संविधान की उपलब्धता लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करती है और यह संदेश देती है कि भारत की विविध भाषाएं और संस्कृतियां शासन व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं.