Kharsawan Shooting Incident: जहां पूरा देश नए साल की खुशियों में डूबा है, वहीं झारखंड अपने शहीदों को याद कर रहा है. यह कोई पिकनिक स्थल नहीं, बल्कि खरसावां गोलीकांड का शहीदी स्थल है. जहां राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन के साथ तमाम नेतागण और अधिकारी शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए जुटे हैं. सबकी आंखें नम हैं और हर कोई उन वीरों को याद कर रहा है, जिन्होंने झारखंड राज्य की नींव के लिए अपने बलिदान दिए.

जमशेदपुर से 60 किलोमीटर दूर है खरसावां
स्टील सिटी जमशेदपुर से करीब साठ किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल कस्बा खरसावां आज शहीद स्थल के नाम से जाना जाता है, लेकिन 1 जनवरी 1948 को यही जगह आजाद भारत के सबसे दर्दनाक और भयावह गोलीकांड की गवाह बनी थी. देश को आजादी मिले अभी 5 महीने भी पूरे नहीं हुए थे. पूरे भारत में नया साल और आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, वहीं खरसावां में निर्दोष आदिवासियों पर गोलियां बरसाई जा रही थीं.
साप्ताहिक हाट के दौरान बड़ी संख्या में पहुंचे थे लोग
उस दिन साप्ताहिक हाट का दिन था. दूर-दराज के गांवों से बूढ़े, बच्चे, महिलाएं और युवा बड़ी संख्या में खरसावां पहुंचे थे. सरायकेला और खरसावां रियासत को उड़ीसा राज्य में मिलाने की तैयारी चल रही थी. राजा इस विलय के लिए तैयार थे, लेकिन यहां की आदिवासी जनता न तो उड़ीसा में जाना चाहती थी और न ही बिहार में. उनकी साफ मांग थी कि उन्हें अलग झारखंड राज्य दिया जाए और अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार मिले.
लोगों को चेतावनी दी गई कि लकीर पार न करें
इसी विरोध को आवाज देने के लिए मरांग गोमके के नाम से जाने जाने वाले आदिवासी नेता और भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों से खरसावां पहुंचने का आह्वान किया था. लोग उन्हें सुनने और देखने के लिए उमड़े थे, लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया. ओडिसा मिलिट्री पुलिस की भारी तैनाती थी और शहीद स्थल के पास एक मशीनगन गाड़कर ज़मीन पर लकीर खींच दी गई थी. लोगों को चेतावनी दी गई थी कि कोई भी उस लकीर को पार न करे.
अचानक चली गोलियां, 50 हजार लोग थे मौजूद
नारेबाजी के बीच हालात बिगड़े और अचानक गोलियों की आवाज गूंज उठी. आदिवासी कुछ समझ पाते, उससे पहले पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. उस दिन करीब पचास हजार आदिवासियों की मौजूदगी बताई जाती है. कितने लोग मारे गए, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा आज तक सामने नहीं आया. अलग-अलग दावों में भारी अंतर है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इस गोलीकांड में करीब दो हजार आदिवासी मारे गए थे.
पूरा कुंआ शवों से भर गया था, इतनी दर्दनाक थी घटना
इस घटना के बाद की कहानी और भी भयावह है. जहां आज शहीद स्थल स्थित है, वहां उस समय एक बड़ा कुआं था, जिसे खरसावां के राजा रामचंद्र सिंहदेव ने बनवाया था. स्थानीय लोगों के अनुसार उस कुएं में सिर्फ शव ही नहीं, बल्कि कई घायल और अधमरे लोगों को भी फेंक दिया गया था और फिर उसे मिट्टी से ढंक दिया गया.
गोलीकांड के बाद इलाके में लागू किया गया था मार्शल लॉ
गोलीकांड के बाद पूरे इलाके में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया. कहा जाता है कि यह आजाद भारत में लगाया गया पहला मार्शल लॉ था. कुछ समय बाद उड़ीसा सरकार ने गांवों में राहत के नाम पर कपड़े भेजे, लेकिन आदिवासियों ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया. लोगों का कहना था कि जो सरकार अपने ही नागरिकों पर गोली चला सकती है, उसका दिया हुआ कपड़ा वे कैसे स्वीकार करें.
जांच के लिए ट्रिब्यूनल का हुआ था गठन
इस गोलीकांड की जांच के लिए एक ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ, यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. न तो दोषियों को सजा मिली और न ही पीड़ितों को इंसाफ. खरसावां में हुई इस त्रासदी का देशभर में असर पड़ा और राजनीतिक दबाव के चलते सरायकेला और खरसावां का उड़ीसा में विलय अंततः रोक दिया गया.
अलग राज्य की मांग
आदिवासियों की अपने राज्य और स्वशासन की मांग कोई नई नहीं थी. बिरसा मुंडा के समय से दिसुम आबुआ राज यानी हमारा देश, हमारा राज का आंदोलन चला आ रहा था. उससे पहले सिद्धू और कानू ने हमारी माटी, हमारा शासन का नारा दिया था. आजादी के बाद भी सरायकेला-खरसावां के आदिवासी यही मांग कर रहे थे कि उनकी अलग झारखंड राज्य की मांग को बरकरार रखा जाए और उन्हें किसी अन्य राज्य में न मिलाया जाए.
हर साल 1 जनवरी को आदिवासी रीति-रिवाज से होती है पूजा
समय बीतने के साथ खरसावां वही जगह बन गई, जिसे आज खरसावां शहीद स्थल के नाम से जाना जाता है. यह स्थान आदिवासी समाज और झारखंड की राजनीति में गहरे भावनात्मक महत्व रखता है. हर साल एक जनवरी को यहां आदिवासी रीति-रिवाज से पूजा की जाती है और झारखंड के सभी बड़े राजनीतिक दल और आदिवासी संगठन शहीदों को श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं. खरसावां अब सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि आदिवासी संघर्ष, शोषण और शहादत का जीवंत प्रतीक बन चुका है.