Jamshedpur Big News: जमशेदपुर के सोनारी थाना में एक 14 वर्षीय बच्चे को कथित तौर पर तीन दिनों से रखे जाने का मामला सामने आया है. बच्चे के परिजनों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है.
परिजनों के अनुसार बच्चा 3 तारीख को शाम करीब साढ़े सात बजे से थाना में है. परिवार का कहना है कि बच्चा रो रहा है, खाना-पीना नहीं कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें उससे मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही है.
परिवार की ओर से कहा गया है कि अगर बच्चे ने कोई गलती की है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन बिना वजह नाबालिग को इस तरह रखने से बच्चे पर मानसिक असर पड़ सकता है.
नाबालिग को लेकर क्या है कानून?
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अनुसार किसी भी नाबालिग बच्चे के साथ सामान्य आरोपी की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता.
कानून के तहत:
- 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को "बालक" माना जाता है.
- ऐसे बच्चे को पुलिस हिरासत में रखने की स्थिति में विशेष प्रक्रिया का पालन करना होता है.
- बच्चे को जल्द से जल्द (24 घंटे के भीतर) किशोर न्याय बोर्ड के सामने प्रस्तुत करना जरूरी होता है.
- बच्चे को थाने के सामान्य लॉकअप में नहीं रखा जा सकता.
- पूछताछ और कार्रवाई के दौरान बच्चे के अधिकारों और सुरक्षा का ध्यान रखना अनिवार्य है.
- बच्चे के माता-पिता या अभिभावक को सूचना देना भी जरूरी होता है.
पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
परिजनों के आरोप सही पाए जाते हैं तो कई सवाल खड़े होते हैं कि क्या बच्चे को निर्धारित प्रक्रिया के तहत रखा गया? क्या किशोर न्याय कानून के प्रावधानों का पालन हुआ? क्या अभिभावकों को सूचना और मिलने का अधिकार दिया गया?
झारखंड पुलिस का नारा "सेवा ही लक्ष्य" है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या किसी नाबालिग के मामले में संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया दोनों का पालन किया गया या नहीं.
वरीय अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल
अगर किसी थाने में नाबालिग को लेकर नियमों का उल्लंघन होता है, तो यह सिर्फ एक थाने का मामला नहीं रह जाता. यह जिले की पुलिस व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है.
अब देखना होगा कि जमशेदपुर के वरीय पुलिस अधीक्षक, सिटी एसपी और अन्य अधिकारी इस मामले की जांच कर क्या कदम उठाते हैं. कानून जनता की सुरक्षा के लिए है, और पुलिस की जिम्मेदारी है कि कार्रवाई भी कानून के दायरे में हो. नाबालिगों से जुड़े मामलों में थोड़ी भी लापरवाही उनके अधिकारों पर सीधा असर डाल सकती है.