चयन प्रक्रिया से नियुक्ति फिर भी नहीं मिली स्थायी नौकरी
यह मामला उन शिक्षकों से जुड़ा है जिनकी नियुक्ति वर्ष 2002 से 2005 के बीच विज्ञापन और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद की गई थी. इनमें संजय कुमार झा, ईशा कुमारी, जय प्रकाश नारायण, शोभा पांडेय, बिमलेश दत्ता मिश्रा, शबनम परवीन और हरेंद्र कुमार सिंह समेत कई शिक्षक शामिल हैं. याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे वर्षों से पीआरटी, टीजीटी और पीजीटी शिक्षक के रूप में लगातार काम कर रहे हैं और स्कूलों का संचालन काफी हद तक उन्हीं पर निर्भर है. अदालत ने भी माना कि इतने लंबे समय तक लगातार सेवा देना इस बात का प्रमाण है कि काम स्थायी प्रकृति का था.
सुनवाई के दौरान डीवीसी ने अदालत में कहा कि शिक्षकों की नियुक्ति केवल संविदा आधार पर हुई थी और नियमितीकरण उनका अधिकार नहीं है. निगम की ओर से यह भी दलील दी गई कि कुछ पदों की संख्या कम कर दी गई है और भविष्य में आउटसोर्सिंग की योजना बनाई गई है. साथ ही याचिकाओं को देरी से दाखिल किया गया बताया गया.
कोर्ट ने कहा आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार करे डीवीसी
न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने डीवीसी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एक वैधानिक संस्था होने के नाते उसे आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार करना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक संविदा पर कर्मचारियों से काम लेना गलत है और इसे शोषण की श्रेणी में रखा जा सकता है. अदालत ने गर्मी की छुट्टियों के दौरान दिए जाने वाले छोटे ब्रेक पर भी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि ये ब्रेक केवल तकनीकी और कृत्रिम थे, जिनका उद्देश्य कर्मचारियों के नियमितीकरण से बचना था. ऐसे ब्रेक से किसी कर्मचारी की निरंतर सेवा समाप्त नहीं मानी जा सकती.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला भी दिया और कहा कि सरकारी संस्थाएं केवल अस्थायी का टैग लगाकर कर्मचारियों से वर्षों तक स्थायी काम नहीं करा सकतीं.
अंत में अदालत ने वर्ष 2016 और 2017 में डीवीसी द्वारा नियमितीकरण से इनकार करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया. साथ ही निर्देश दिया कि सभी शिक्षकों को नियमित कर्मचारी मानते हुए सेवा से जुड़े सभी लाभ दिए जाएं.