Jharkhand News: भूमि विवाद से सम्बंधित अवमानना याचिका मामले में सुनवाई देते हुए झारखण्ड हाईकोर्ट ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब किसी अधिकारी के गलत निर्णय की जानकारी पहले से हो, तब भी वर्षों तक कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है। यह अवमानना याचिका जमीन मुआवजा एवं वंशावली विवाद से जुड़ी है।
हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने मंशा सिंह ऊर्फ राजेश सिंह की अवमानना याचिका पर सुनवाई की। 9 मार्च 2026 के आदेश के अनुपालन में भूमि सुधार एवं निबंधन विभाग के सचिव, रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री, नामकुम के अंचल अधिकारी सशरीर अदालत में उपस्थित हुए थे।
खंडपीठ ने कहा कि कि अवैध निर्णयों के बावजूद कार्रवाई में देरी व्यवस्था को कमजोर करती है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि उपायुक्त ने 2017 में ही कार्रवाई की आवश्यकता महसूस की थी, तो इतने लंबे समय तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया।
इससे पहले भूमि सुधार एवं निबंधन विभाग के सचिव ने अदालत को बताया कि डिप्टी कमिश्नर को सर्किल ऑफिसर और सर्किल इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है, लेकिन राजस्व कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार उपायुक्त के पास होता है।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ को बताया गया कि 24 जुलाई 2017 के मेमो संख्या 1165(ii) में दिए गए निर्णय के आधार पर अब संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
इसपर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब उपायुक्त रांची ने 24 जुलाई 2017 को आदेश पारित किया था और उस आदेश को हाईकोर्ट के एकल पीठ ने भी सही ठहराया था, तो आठ साल तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
अगली सुनवाई की तारीख तय
खंडपीठ ने सरकार से पूछा कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए व्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाएगा। इसपर विभागीय सचिव ने बताया कि इस विषय पर कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग के प्रधान सचिव से परामर्श किया जाएगा और अगली सुनवाई में हलफनामा दाखिल किया जाएगा।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल निर्धारित की है। कोर्ट ने फिलहाल तीनों अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी गई है।