विविधता में एकता के सिद्धांत पर चोट
सुनवाई के दौरान पीठ ने गहरी चिंता व्यक्त की कि यूजीसी के नए नियम भारत की मूल भावना विविधता में एकता के विपरीत हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि भेदभाव की परिभाषा को केवल कुछ विशेष वर्गों तक ही सीमित रखा गया, तो यह कैंपस के भीतर छात्रों के बीच दरार पैदा करने का काम करेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेहद भावुक होते हुए प्रशासन को आगाह किया, क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे लौट रहे हैं, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल जैसी व्यवस्थाएं समाज को बांटती हैं।
कोर्ट के दो तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी से विशेष रूप से दो बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है, जब भारतीय कानून में भेदभाव की परिभाषा पहले से ही स्पष्ट है, तो जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, नए नियमों के दायरे से रैगिंग जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों को बाहर क्यों रखा गया है।
सामान्य वर्ग के संरक्षण पर चिंता
अदालत ने तर्क दिया कि उत्पीड़न किसी भी छात्र का हो सकता है। पीठ के अनुसार, सामान्य या गैर-आरक्षित वर्ग के छात्र भी अपनी विशिष्ट जातिगत पहचान या उप-जाति के कारण कैंपस में प्रताड़ना का शिकार हो सकते हैं। नए नियमों में इस वर्ग के लिए पर्याप्त सुरक्षा तंत्र का अभाव है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन प्रतीत होता है।
विवाद की पृष्ठभूमि और दलीलें
उल्लेखनीय है कि 13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को बदलकर एक नई अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियां बनाना अनिवार्य कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि ये नियम एकतरफा हैं और सामान्य वर्ग के छात्रों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाते हैं। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने नियमों का बचाव करते हुए कहा कि ये नियम दशकों के कानूनी संघर्ष और हाशिए पर खड़े समुदायों की सुरक्षा के लिए लाए गए हैं, जिन्हें बिना पूरी सुनवाई के रोकना उचित नहीं है।
आगे की राह, विशेषज्ञों की समिति का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि इन नियमों पर देश के प्रख्यात न्यायविदों और विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इससे नियमों की शब्दावली को अधिक समावेशी और स्पष्ट बनाया जा सकेगा ताकि भविष्य में इनके दुरुपयोग की कोई गुंजाइश न रहे।
जब तक इस मामले पर अगली सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक यूजीसी के 2026 के नए नियम प्रभावी नहीं होंगे। इस दौरान 2012 के पुराने नियम ही शैक्षणिक संस्थानों में लागू रहेंगे।