Bihar News: बिहार के छपरा जिले से सामने आई यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जो संकट की घड़ी में साथ छोड़ देता है. मढोरा प्रखंड के जवईनियां गांव की रहने वाली बबीता देवी की मौत के बाद उनका अंतिम सफर पूरी तरह बेटियों के कंधों पर आ गया. जिनसे सहारे की उम्मीद थी, वही पीछे हट गए.
30 जनवरी को पटना में इलाज के दौरान बबीता देवी की मौत हो गई. वह टीवी की बीमारी से जूझ रही थीं और पीएमसीएच में उनका इलाज चल रहा था. पति रविंद्र सिंह का देहांत डेढ़ साल पहले हो चुका था. इसके बाद परिवार पूरी तरह आर्थिक संकट में घिर गया था. मां की मौत के साथ ही घर में बची सिर्फ दो बेटियां मौसम और रौशन रह गईं.
कोई कंधा देने नहीं आया
मां की मौत के बाद न रिश्तेदार पहुंचे और न ही गांव से कोई साथ देने आगे आया. शव को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए भी कोई तैयार नहीं हुआ. समाज की परंपराओं के बावजूद, जहां मुखाग्नि आमतौर पर पुत्र देते हैं, यहां बेटियों को ही सब कुछ करना पड़ा. दोनों बहनों ने खुद अर्थी उठाई और मां को अंतिम विदाई देने निकल पड़ीं.
बेटियों ने निभाई सारी रस्में
मौसम और रौशन ने बताया कि उन्होंने हर संभव जगह मदद मांगी, लेकिन किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया. मजबूरी में दोनों ने खुद ही दाह संस्कार का फैसला किया. बड़ी बेटी मौसम ने मां को मुखाग्नि दी. इस पल में उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन हौसले में कोई कमी नहीं थी.
गरीबी ने बढ़ाई दूरी
परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. पति की मौत के बाद बबीता देवी और उनकी बेटियां धीरे-धीरे समाज से कटती चली गईं. सीमित संसाधनों और हालात ने उन्हें अकेला कर दिया. गांव के लोग भी यही कहते हैं कि गरीबी और दूरी की वजह से कोई आगे नहीं आया.
तेरहवीं के लिए भी संघर्ष
दाह संस्कार के बाद अब बेटियां मां की तेरहवीं और अन्य कर्मकांड के लिए पैसे जुटाने में असमर्थ हैं. उनके पास न स्थायी आय है और न कोई सहारा. वे समाज और प्रशासन से मदद की गुहार लगा रही हैं ताकि यह आखिरी रस्म भी पूरी हो सके.
समाज की संवेदनहीनता पर सवाल
यह घटना सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि समाज की सोच पर भी सवाल खड़े करती है. जहां अंतिम संस्कार जैसे समय पर भी कोई साथ न दे, वहां सामाजिक एकता की बातें खोखली लगती हैं. अब दोनों बहनें प्रशासन से आर्थिक सहायता की उम्मीद लगाए बैठी हैं.
यह घटना बताती है कि गरीबी और सामाजिक दूरी किस तरह इंसान को अकेला बना देती है. बेटियों का साहस प्रेरणादायक है, लेकिन समाज की बेरुखी चिंता का विषय है. अगर समय पर सामुदायिक और प्रशासनिक सहयोग मिलता, तो यह दर्द इतना गहरा नहीं होता.