Jharkhand News: देवघर के त्रिकूट रोपवे हादसे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया है. यह नोटिस दामोदर रोपवे एंड इंफ्रा लिमिटेड की याचिका पर दिया गया है, जिसमें कंपनी ने राज्य सरकार द्वारा उसे पांच वर्षों के लिए ब्लैक लिस्ट किए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी है. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष हुई.
क्या है मामला
DRIL ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि दुर्घटना के बाद उस पर लगाई गई ब्लैक लिस्टिंग की अवधि और आर्थिक दंड अत्यधिक है. कंपनी का तर्क है कि इस निर्णय से उसके व्यावसायिक अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.
नोटिस किसे और क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में झारखंड सरकार और झारखंड पर्यटन विकास निगम को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है. अदालत ने DRIL को यह भी अनुमति दी है कि वह मामले से जुड़े नए तथ्यों को रिकॉर्ड पर ला सके. अदालत इस बात पर भी विचार करेगी कि दुर्घटना की गंभीरता की तुलना में ब्लैक लिस्टिंग की अवधि कितनी न्यायसंगत है.
हाईकोर्ट में हार के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
राज्य सरकार की कार्रवाई को पहले हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जहां DRIL की याचिका खारिज कर दी गई. इसके बाद कंपनी ने पुनर्विचार याचिका दायर की, लेकिन उसे भी अस्वीकार कर दिया गया. न्यायालय ने कहा था कि कंपनी की ओर से कोई नया तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया है.
सरकारी कार्रवाई का आधार
10 अप्रैल 2022 को त्रिकूट रोपवे पर हुए भीषण हादसे के बाद राज्य सरकार ने उच्च स्तरीय जांच कराई थी. जांच में कंपनी को दोषी ठहराया गया, जिसके बाद उस पर 9.11 करोड़ रुपये का दंड लगाया गया और पांच वर्षों के लिए ब्लैक लिस्ट कर दिया गया.
देवघर रोपवे दुर्घटना एक नजर में
- 2005 में राइट्स ने DRIL को रोपवे निर्माण का कार्य सौंपा
- 21 जुलाई 2008 को रोपवे पर्यटन विभाग को सौंपा गया
- संचालन की जिम्मेदारी JTDC को दी गई
- 10 अप्रैल 2022 को दुर्घटना, दो लोगों की मौत, 59 यात्री फंसे
- राहत कार्य में सेना को लगाया गया
- 19 अप्रैल 2022 को उच्च स्तरीय जांच के आदेश
- जांच में DRIL को दोषी ठहराया गया
- 9.11 करोड़ रुपये का दंड और पांच साल की ब्लैक लिस्टिंग
- दंड वसूली की जिम्मेदारी JTDC को, पर अब तक वसूली नहीं
त्रिकूट रोपवे हादसा केवल एक तकनीकी विफलता नहीं था, बल्कि उन दर्जनों परिवारों के लिए जीवन भर का दर्द बन गया, जिनके अपने उस दिन हवा में झूलते केबिनों में फंसे रहे. यह मामला आज भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है. सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई न केवल कंपनी और सरकार के लिए, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए भी एक अहम दिशा तय कर सकती है.