सूत्रों के अनुसार, हेमंत सोरेन ने असम के उन इलाकों पर विशेष ध्यान दिया है, जहां आदिवासी और चाय बागान मजदूरों की संख्या निर्णायक मानी जाती है। इन वर्गों में झामुमो की विचारधारा और संगठन को विस्तार देने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
भाजपा ने झामुमो की मौजूदगी पर उठाए सवाल
वहीं, असम की सत्तारूढ़ भाजपा ने झामुमो की सक्रियता को ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहा है कि राज्य में झामुमो की कोई ठोस सांगठनिक स्थिति नहीं है। भाजपा नेताओं का दावा है कि असम की राजनीति में बाहरी दलों के लिए जगह बनाना आसान नहीं है।
झामुमो ने बताया जमीनी हकीकत जानने का प्रयास
झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि हेमंत सोरेन का यह दौरा पूरी तरह से जमीनी हकीकत को समझने के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ने या गठबंधन से जुड़े फैसले पार्टी का शीर्ष नेतृत्व समय आने पर करेगा।
असम की राजनीति में बदल सकते हैं समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि झामुमो आदिवासी और चाय बागान समुदाय को अपने पक्ष में संगठित करने में सफल होती है, तो असम की कई विधानसभा सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हेमंत सोरेन की सक्रियता ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि असम की राजनीति में आने वाले दिनों में नए राजनीतिक समीकरण उभर सकते हैं।
कुल मिलाकर, असम चुनाव से पहले झामुमो की यह पहल राज्य की सियासत में नई करवट ला सकती है, जिस पर सभी दलों की नजरें टिकी हुई हैं।