Jharkhand News: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में पुलों के निर्माण में बरती गई अनियमितताओं को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को 24 फरवरी तक शपथ पत्र दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है. खंडपीठ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस समय सीमा के भीतर जवाब पेश नहीं किया गया, तो सचिव पर 10,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया जाएगा, जिसे उन्हें अपने वेतन या निजी कोष से भरना होगा.
अदालती निर्देशों की अनदेखी पर नाराजगी
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि पूर्व में दिए गए आदेशों के बावजूद अब तक विभाग की ओर से कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया गया है. रिकॉर्ड के अनुसार, सबसे पहले 27 नवंबर को जवाब मांगा गया था, जिसके बाद 9 जनवरी को सरकार ने आश्वासन दिया था, लेकिन प्रक्रिया अधूरी रही. न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि अधिकारियों द्वारा शपथ पत्र दाखिल करने में की जा रही देरी न्याय प्रक्रिया में बाधा है, इसीलिए अब “लास्ट चांस” के साथ आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है.
10 साल में बने पुलों की जांच की मांग
यह पूरा मामला पंकज कुमार यादव द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि पिछले 10 वर्षों के दौरान ग्रामीण विकास विभाग द्वारा निर्मित कई पुलों की गुणवत्ता अत्यंत निम्न स्तर की है. शिकायत के अनुसार, इनमें से कई पुल उद्घाटन के कुछ समय बाद ही क्षतिग्रस्त हो गए हैं या उनमें गंभीर दरारें आ गई हैं. याचिकाकर्ता ने इन निर्माण कार्यों की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है.
अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित
अदालत ने याचिकाकर्ता को भी यह छूट दी है कि वह सरकार के शपथ पत्र के जवाब में 11 मार्च तक अपना प्रति-उत्तर (Rejoinder) दाखिल कर सकते हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने अगली विस्तृत सुनवाई के लिए 18 मार्च की तारीख मुकर्रर की है. तब तक सरकार को हर हाल में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी.
न्यायालय का यह आदेश प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. अक्सर देखा जाता है कि सरकारी विभाग अदालती मामलों में हलफनामा दाखिल करने में महीनों लगा देते हैं, जिससे जनहित के मामले लटके रहते हैं. सचिव पर व्यक्तिगत जुर्माने की शर्त यह सुनिश्चित करने के लिए है कि विभागीय लापरवाही का खामियाजा सरकारी खजाने (जनता के पैसे) पर न पड़े. पुलों की गुणवत्ता का मुद्दा सीधे तौर पर जनसुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट की यह सख्ती आवश्यक प्रतीत होती है.