विधानसभा में दिए गए जवाब में सरकार ने स्वीकार किया कि राज्य के विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों में 38,027 सेविकाएँ और 37,384 सहायिकाएँ, यानी कुल 75,411 कर्मी मानदेय पर कार्यरत हैं। सरकार ने यह भी माना कि इन कर्मियों से बीएलओ, जनगणना और ‘मईया सम्मान योजना’ के सत्यापन जैसे अतिरिक्त कार्य भी कराए जाते हैं।
मानदेय के मुद्दे पर सरकार ने बताया कि सेविकाओं को 11,500 रुपये और सहायिकाओं को 5,750 रुपये प्रतिमाह दिया जा रहा है। प्रत्येक वर्ष जुलाई से क्रमशः 500 और 250 रुपये की वार्षिक वृद्धि का प्रावधान है। सरकार के अनुसार वर्तमान मानदेय में केंद्र सरकार का अंशदान 23.4 प्रतिशत है, जबकि शेष राशि राज्य सरकार वहन करती है।
हालांकि विधायक पूर्णिमा साहू ने इस आंकड़े पर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविकता में केंद्र सरकार का अंशदान 60 प्रतिशत और राज्य का 40 प्रतिशत है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए केंद्र पर ठीकरा फोड़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र द्वारा समय पर राशि उपलब्ध कराए जाने के बावजूद सेविकाओं को दो से तीन महीने की देरी से मानदेय मिल रहा है, जिससे वे आर्थिक संकट झेल रही हैं।
पोषाहार निर्माण के लिए जलावन मद पर भी बहस हुई। सरकार ने 13 पैसे प्रति बच्चा प्रति मील की दर की बात से इनकार करते हुए बताया कि 35,522 आंगनबाड़ी केंद्रों में एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध है और रीफिलिंग की राशि दी जाती है। शेष 3,435 केंद्रों में कनेक्शन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया जारी है। जिन केंद्रों में गैस सुविधा नहीं है, उन्हें प्रति बच्चा प्रति मील अधिकतम 0.13 रुपये जलावन मद में दिए जा रहे हैं।
विधायक ने आरोप लगाया कि गैस एजेंसियों को समय पर भुगतान नहीं होने से सिलेंडर की आपूर्ति बाधित होती है, जिससे महिलाओं और बच्चों को समय पर भोजन नहीं मिल पाता। डिजिटल व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए पूर्णिमा साहू ने कहा कि सेविकाओं को दिए गए 4G मोबाइल फोन फेस स्कैनिंग जैसी प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने 5G मोबाइल उपलब्ध कराने की मांग की और कहा कि तकनीकी संसाधनों के अभाव में योजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिल पा रहा है।
मानदेय और जलावन दर में वृद्धि के संबंध में सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस विषय पर कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
विधायक पूर्णिमा साहू ने चेतावनी दी कि यदि आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो वे इस मुद्दे को पुनः विधानसभा में मजबूती से उठाएंगी। उन्होंने कहा कि सरकार को जमीनी हकीकत समझते हुए इन कर्मियों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।