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  • 2026-02-20

Jharkhand News: पुलिस मुख्यालय में बैठक, नए कानून और ई-साक्ष्य ऐप को लेकर गृह मंत्रालय ने कसी कमर

Jharkhand News: झारखंड पुलिस अब आधुनिक तकनीक और नए आपराधिक कानूनों के सहारे अपराधियों पर नकेल कसने की तैयारी में है. शुक्रवार को रांची स्थित पुलिस मुख्यालय के सभागार में एक बेहद महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक हुई. इस बैठक की कमान भारत सरकार के गृह मंत्रालय की संयुक्त सचिव (आंतरिक सुरक्षा-II) निष्ठा तिवारी और झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्र ने संयुक्त रूप से संभाली. बैठक का मुख्य एजेंडा पुलिसिंग को डिजिटल बनाना और नए कानूनों को धरातल पर उतारना था.

डिजिटल सबूतों के लिए ई-साक्ष्य ऐप पर फोकस
बैठक में ई-साक्ष्य ऐप के प्रभावी इस्तेमाल पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया. संयुक्त सचिव निष्ठा तिवारी ने जिलों में इस ऐप के संचालन के दौरान आने वाली तकनीकी बाधाओं और व्यावहारिक दिक्कतों की गहन समीक्षा की. अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए कि सभी पुराने और नए मामलों का अनुसंधान तय समय सीमा के भीतर पूरा किया जाए. जांच की गुणवत्ता को विश्वस्तरीय बनाने के लिए अब वैज्ञानिक तरीकों और फॉरेंसिक टीमों की मदद लेना अनिवार्य कर दिया गया है. साक्ष्य जुटाने के लिए अब परंपरागत तरीकों के साथ डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जाएगी.

साइबर क्राइम और ड्रग्स के खिलाफ बनेगा सख्त प्लान
पुलिस मुख्यालय में हुई इस चर्चा में केवल जांच के तरीके ही नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा से जुड़े बड़े खतरों पर भी मंथन हुआ. बैठक में साइबर अपराध, आतंकवाद, ड्रग तस्करी और काउंटर टेररिज्म जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत रणनीति बनाई गई. इसके साथ ही राज्य में पुलिस आधुनिकीकरण और विदेशी नागरिकों की वैधता से जुड़ी समस्याओं की भी समीक्षा की गई. इस बैठक में आईजी प्रभात कुमार, असीम विक्रांत मिंज, डॉ. शाहिल अरोड़ा, ए. विजयालक्ष्मी और डॉ. माईकलराज एस समेत कई सीनियर अधिकारी मौजूद रहे.

झारखंड पुलिस की यह कवायद दर्शाती है कि अब अपराध की जांच केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगी. ई-साक्ष्य ऐप का अनिवार्य उपयोग पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाएगा और अदालतों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता बढ़ाएगा. गृह मंत्रालय की सक्रियता यह संकेत देती है कि आने वाले समय में साइबर क्राइम और नशीले पदार्थों के खिलाफ झारखंड में बड़े स्तर पर “क्रैकडाउन” देखने को मिल सकता है. वैज्ञानिक अनुसंधान और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की मदद लेने से केस के पेंडिंग होने की समस्या में भी कमी आने की उम्मीद है.
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