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  • 2026-03-01

Jharkhand News: कुड़मी समाज की महारैली में गूंजी एसटी दर्जा और कुड़माली भाषा को मान्यता की मांग

Jharkhand News: झारखंड में कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा देने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चली आ रही मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है. रांची के धुर्वा स्थित प्रभात तारा मैदान में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के बैनर तले आयोजित कुड़मी अधिकार महारैली में राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और युवा शामिल हुए.


महारैली में उमड़ा जनसैलाब कुड़मी समाज की एकजुटता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बना. हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार आवाज उठाई. मंच से दो प्रमुख मांगें सामने रखी गईं. पहली, कुड़मी-कुरमी महतो समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की श्रेणी से हटाकर अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए. दूसरी, कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया जाए.


वक्ताओं ने दावा किया कि 1931 की जनगणना से पहले झारखंड क्षेत्र में कुड़मी समुदाय को एसटी सूची में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में साजिशन इसे सूची से हटा दिया गया. उन्होंने इसे ऐतिहासिक अन्याय करार देते हुए सुधार की मांग की.

बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के मुख्य संयोजक शीतल ओहदार ने अपने संबोधन में कहा कि आज की भीड़ यह साबित करती है कि कुड़मी-महतो समाज अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हो चुका है. उन्होंने कहा कि खान-पान, रहन-सहन, पर्व-त्योहार, पूजा-पाठ और भाषा के आधार पर उनका समाज आदिवासी समुदाय से मेल खाता है, फिर भी उन्हें एसटी का दर्जा नहीं दिया गया. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा.

रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव और शिक्षाविद डॉ. अमर चौधरी ने कहा कि कुड़मी समाज लंबे समय से लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता आया है. रेल रोको जैसे आंदोलनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो आंदोलन दिल्ली तक ले जाया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि यदि कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया और एसटी दर्जा नहीं मिला तो इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है.

मंच से यह भी कहा गया कि एसटी दर्जा नहीं मिलने के कारण समुदाय के लोगों को शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है. वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जब जीवनशैली और परंपराएं आदिवासी समाज से मिलती-जुलती हैं, तो एसटी दर्जा देने में आपत्ति क्यों है.

इस महारैली के आयोजन का समय भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले कुछ आदिवासी संगठनों ने कुड़मी समुदाय को एसटी में शामिल करने का विरोध किया था. उनका तर्क है कि इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है. कुड़मी नेताओं ने इसे अपने अधिकारों के समर्थन में जवाबी प्रदर्शन बताया.

करीब 18 कुड़मी संगठनों के संयुक्त प्रयास से आयोजित इस रैली को ऐतिहासिक बताया गया. रैली में शामिल लोगों ने संकल्प लिया कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. झारखंड की राजनीति में यह मुद्दा अब और अधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण बनता जा रहा है.

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