Jamshedpur Nagadih Mob Lynching: कहते हैं कि वक्त हर घाव को भर देता है, लेकिन कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनकी टीस और दर्द कभी कम नहीं होते। 18 मई 2017 की वह काली और खौफनाक शाम आज भी जमशेदपुर के लोगों के जेहन में एक गहरे सदमे की तरह जिंदा है। बागबेड़ा थाना क्षेत्र के नागाडीह में महज "बच्चा चोरी" की एक खोखली और बेबुनियाद अफवाह ने ऐसा तांडव मचाया कि इंसानियत का जनाजा निकल गया था। इस दिल दहला देने वाले मॉब लिंचिंग कांड को आज पूरे 9 साल बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित वर्मा परिवार के आंसू आज भी उतने ही नए हैं, उनका दर्द आज भी उतना ही हरा है।
आज श्रद्धांजलि सभा में नम आंखों से याद आई "वो भयावह शाम"
घटना के 9 वर्ष पूरे होने पर आज जुगसलाई नया बाजार में एक बेहद भावुक कर देने वाला नजारा देखने को मिला। जहां स्थानीय लोग, और मृतकों के स्वजन एकत्रित हुए। उस खौफनाक मंजर की भेंट चढ़े मासूमों की तस्वीरों पर जब पुष्प अर्पित किए गए, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं। परिजनों और स्थानीय लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर और मौन रखकर उन बेगुनाह जिंदगियों को शिद्दत से याद किया, जिन्हें भीड़तंत्र की क्रूरता ने असमय ही मौत के मुंह में धकेल दिया था। पूरा माहौल सिसकियों और अपनों को खोने के गम से भारी हो उठा था।
पोतों की जिंदगी की भीख मांगती रही बूढ़ी दादी, पर पत्थरों का दिल नहीं पसीजा
यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा थी। जुगसलाई के रहने वाले दो सगे भाई विकास वर्मा और गौतम वर्मा अपने दोस्त गंगेश के साथ वहां पहुंचे थे। तभी अचानक उन्मादी भीड़ ने उन्हें घेर लिया। इस खौफनाक मंजर का सबसे दर्दनाक और मार्मिक पहलू यह था कि लड़कों की 76 वर्षीय बूढ़ी दादी, रामसखी देवी, वहां मौजूद थीं। वह हाथ जोड़कर, पैरों में गिरकर भीड़ से अपने पोतों की जिंदगी की भीख मांगती रहीं, लेकिन खून सवार हो चुकी भीड़ पर ममता की उस पुकार का कोई असर नहीं हुआ। भीड़ ने दोनों भाइयों और उनके दोस्त को तड़पा-तड़पा कर मार डाला और उस बुजुर्ग दादी को भी नहीं बख्शा। गंभीर रूप से घायल दादी ने भी करीब एक महीने तक अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद दम तोड़ दिया था।
न्याय की अधूरी आस और बेबस पिता का दर्द
इस खौफनाक वारदात ने तब पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा व्यवस्था पर था, क्योंकि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद भीड़ इतनी बेकाबू हो गई थी कि कानून तमाशबीन बना रहा। मृतक विकास और गौतम के पिता मणिचंद्र वर्मा के दुखों का अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है, जिन्होंने एक ही दिन में अपने दो जवान बेटों, अपनी बूढ़ी मां और घर के चिरागों को हमेशा के लिए खो दिया। आज 9 साल बीत जाने के बाद भी परिवार मानसिक और सामाजिक रूप से उस सदमे से उबर नहीं पाया है।
कानूनी लड़ाई जारी, चश्मदीद बोले- "वो मंजर भुलाए नहीं भूलता"
इस केस में अदालत की लंबी प्रक्रिया चली। पिछले साल 8 अक्टूबर 2025 को जमशेदपुर कोर्ट ने 5 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, जबकि 22 लोग सबूतों के अभाव में बरी हो गए। हालांकि, इस मामले में तीन आरोपी आज भी फरार हैं और सजा पाए कुछ आरोपियों को उच्च न्यायालय से जमानत भी मिल चुकी है। इस घटना में किसी तरह जिंदा बचे प्रत्यक्षदर्शी उत्तम वर्मा आज भी उस शाम को याद कर सिहर उठते हैं। उनका कहना है, "वह ईश्वर का चमत्कार था कि मैं बच गया, लेकिन जो खौफनाक मंजर मैंने अपनी आंखों से देखा, वह मरते दम तक मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा। पुलिस के सामने मेरे अपनों को मार दिया गया। भगवान किसी को भी ऐसी खौफनाक मौत न दे।" वर्मा परिवार के लिए इंसाफ की यह लड़ाई आज भी जारी है, लेकिन वे जानते हैं कि जो अपने चले गए, उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।