Chatra Stone Mining: चतरा जिले में स्टोन माइनिंग पट्टे को समय से पहले निरस्त करने का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे चुका है. झारखंड सरकार ने सूबे के उच्च न्यायालय के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें अधिकारियों की प्रशासनिक शक्तियों पर सवाल उठाए गए थे. यह पूरा कानूनी विवाद असल में इस बात पर टिका है कि खनिज नियमों के तहत किसी कंपनी का खनन पट्टा रद्द करने का असली हकदार जिला उपायुक्त है या फिर राज्य सरकार.
दिल्ली की दो कंपनियों को चतरा में मिला था पत्थर खनन का पट्टा
इस पूरे मामले की शुरुआत एक दशक पहले हुई थी, जब साल 2016 में देश की राजधानी दिल्ली की दो बड़ी व्यावसायिक फर्मों, "मेसर्स शिप्रा पावर एंड फ्यूल प्राइवेट लिमिटेड" और "मेसर्स बुद्ध स्मृति माइनिंग इन्फ्राकॉन प्राइवेट लिमिटेड" को चतरा के इलाके में पत्थर उत्खनन की मंजूरी मिली थी. हालांकि, यह काम लंबा नहीं खिंच सका और करीब पांच साल बाद फरवरी 2021 में चतरा के तत्कालीन उपायुक्त ने नियमों का हवाला देते हुए दोनों ही कंपनियों के आवंटन को बीच में ही निरस्त कर दिया था.
खान आयुक्त की अदालत से भी कंपनियों को नहीं मिली थी राहत
जिला प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई से असहमत होकर दोनों कंपनियों ने राहत के लिए खान आयुक्त के समक्ष अपनी पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटिशन) दायर की. दो साल तक चली कानूनी दलीलों और सुनवाई के बाद, मार्च 2023 में खान आयुक्त ने भी जिला उपायुक्त के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी और कंपनियों की अर्जी खारिज कर दी. इस प्रशासनिक फैसले की लिखित जानकारी कंपनियों को करीब चार महीने बाद जुलाई में साझा की गई थी.
हाईकोर्ट ने क्षेत्राधिकार का हवाला देकर पलट दिया था अफसरों का फैसला
प्रशासनिक स्तर पर झटका खाने के बाद कंपनियों ने झारखंड हाईकोर्ट की शरण ली. मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ के सामने कंपनियों के वकीलों ने सबसे बड़ा तकनीकी पेंच यह फंसाया कि जब उन्होंने खनन की किसी शर्त का उल्लंघन ही नहीं किया, तो उपायुक्त को समय से पहले लीज खत्म करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है; यह शक्ति सिर्फ राज्य सरकार में निहित है. चूंकि सरकारी अधिवक्ता अदालत में इस क्षेत्राधिकार की दलील का मजबूत प्रतिवाद नहीं कर सके, इसलिए हाईकोर्ट ने अफसरों के पुराने आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया था.
अब दिल्ली में तय होगा चतरा के माइनिंग ब्लॉक का भविष्य
उच्च न्यायालय से कंपनियों के पक्ष में फैसला आने और उनकी माइनिंग लीज बहाल होने के बाद अब राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई थी. इसी को देखते हुए सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है. राज्य सरकार का तर्क है कि स्थानीय स्तर पर राजस्व और पर्यावरण के हितों को देखते हुए की गई यह कार्रवाई नियमों के अनुकूल थी, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट की बेंच अंतिम फैसला सुनाएगी.