Jamshedpur News: आज की तेज रफ्तार और पूरी तरह डिजिटल होती दुनिया में मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य कार्यस्थलों की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बनता जा रहा है. लगातार बढ़ते काम के दबाव, निजी और पेशेवर जीवन के बीच बिगड़ते संतुलन और हर समय जुड़े रहने की मजबूरी ने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित किया है. ऐसे माहौल में अब कंपनियां भावनात्मक खुशहाली को केवल व्यक्तिगत विषय नहीं बल्कि कार्य संस्कृति और नेतृत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा मानने लगी हैं. टाटा स्टील के मुख्य खुशहाली अधिकारी मुकेश अग्रवाल ने इसी विषय पर अपने विचार साझा किए.
मानसिक स्वास्थ्य अब हाशिए का नहीं बल्कि मुख्य विषय
मुकेश अग्रवाल ने कहा कि हर साल मई में मनाया जाने वाला मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता माह लोगों को यह समझाने का काम करता है कि मानसिक स्वास्थ्य अब कोई छोटा या सीमित विषय नहीं रह गया है. यह सीधे तौर पर लोगों के जीवन, काम करने के तरीके, रिश्तों और प्रदर्शन से जुड़ चुका है.
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज और संस्थाओं की सोच में बड़ा बदलाव आया है. पहले लोग इस विषय पर खुलकर बात करने से बचते थे, लेकिन अब इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल की प्राथमिकता माना जा रहा है.
कोविड के बाद बढ़ा मानसिक और भावनात्मक दबाव
उन्होंने बताया कि कोविड महामारी के बाद कर्मचारियों के जीवन में कई नई चुनौतियां सामने आई हैं. घर और दफ्तर के बीच की सीमाएं काफी कमजोर हो गई हैं. लोगों को एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं. लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव, भविष्य को लेकर असुरक्षा, परिवार की जिम्मेदारियां और हर समय मोबाइल तथा डिजिटल सूचनाओं से जुड़े रहने की आदत मानसिक तनाव को बढ़ा रही है.
उनके अनुसार इन परिस्थितियों ने कर्मचारियों के भीतर भावनात्मक थकान और मानसिक दबाव को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है. यही वजह है कि अब दुनिया भर की संस्थाएं कर्मचारियों की खुशहाली को केवल मानव संसाधन विभाग का विषय नहीं बल्कि पूरे संगठन और नेतृत्व से जुड़ा मामला मान रही हैं.
बीमारी से आगे बढ़कर खुशहाली और मानसिक मजबूती पर हो रहा फोकस
मुकेश अग्रवाल ने कहा कि अब मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी के नजरिए से नहीं देखा जा रहा है. संस्थाएं अब भावनात्मक मजबूती, खुशी, मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दे रही हैं.
उन्होंने कहा कि इस बदलाव से लोगों के भीतर मौजूद झिझक और सामाजिक डर कम हो रहा है. अब कर्मचारी अपनी परेशानियों को पहले की तुलना में अधिक खुलकर साझा कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर मदद लेने के लिए आगे आ रहे हैं.
टाटा स्टील ने शुरू किए खुशहाली बढ़ाने वाले अभियान
मुकेश अग्रवाल ने बताया कि टाटा स्टील में इस महीने की शुरुआत खुशहाल जीवन के विज्ञान पर आधारित वेब परिचर्चा से की गई. इसमें सजग जीवनशैली और भावनात्मक मजबूती जैसे विषयों पर चर्चा हुई.
इसके बाद कंपनी ने 15 दिनों का खुशहाली अभियान चलाया. इस अभियान के तहत कर्मचारियों को रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव अपनाने के लिए प्रेरित किया गया. इसमें आभार व्यक्त करना, काम के बीच मानसिक विश्राम लेना, परिवार के साथ समय बिताना और दूसरों के प्रति दया भाव दिखाना जैसे अभ्यास शामिल थे.
कंपनी की ओर से कर्मचारियों के लिए चौबीसों घंटे सहायता सेवा और गोपनीय परामर्श की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई ताकि जरूरत पड़ने पर कर्मचारी बिना झिझक सहायता ले सकें.
भविष्य के कार्यस्थलों में सहानुभूति और भरोसा होगा सबसे जरूरी
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में संस्थाओं को केवल संकट आने पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. कंपनियों को ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहां कर्मचारी बिना डर अपनी बात कह सकें, रुक सकें और जरूरत पड़ने पर मदद मांग सकें.
मुकेश अग्रवाल के अनुसार मानसिक खुशहाली केवल नियम और नीतियां बनाकर हासिल नहीं की जा सकती. इसके लिए सहानुभूति, भरोसा, समावेशिता और मजबूत मानवीय रिश्तों को कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाना जरूरी है.
उन्होंने कहा कि जो संस्थाएं केवल काम और प्रदर्शन ही नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों को भी महत्व देंगी, वही भविष्य में मजबूत और स्वस्थ कार्यस्थल तैयार कर पाएंगी. ऐसे संगठन समाज में अधिक सकारात्मक, खुशहाल और संतुलित माहौल बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाएंगे.