Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी सीसीएल (CCL) को बड़ा झटका देते हुए एक पूर्व कर्मचारी के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने कंपनी को कर्मचारी बैजनाथ महतो का करीब 26 वर्षों का बकाया वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी समेत सभी सेवानिवृत्ति लाभ निर्धारित समय में भुगतान करने का निर्देश दिया है.
छह सप्ताह में भुगतान का आदेश
हाईकोर्ट ने सीसीएल के 24 दिसंबर 2014 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें बैजनाथ महतो को बकाया वेतन देने से इनकार किया गया था. अदालत ने कंपनी को छह सप्ताह के भीतर वर्ष 1989 से पुनर्बहाली तक का वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और अन्य सभी वैधानिक लाभ देने का निर्देश दिया.
"नो वर्क, नो पे" नियम लागू नहीं
अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द हो चुकी हो और नियोक्ता तय समय के भीतर दोबारा विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं करता, तो ऐसे मामलों में "नो वर्क, नो पे" का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता.
1989 में गई नौकरी, 2015 में हुई बहाली
बैजनाथ महतो को वर्ष 1981 में विस्थापित श्रेणी के तहत सीसीएल में नौकरी मिली थी. वर्ष 1989 में चोरी के एक मामले के बाद उन्हें निलंबित कर सेवा से हटा दिया गया. बाद में आपराधिक मामले में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया.
इसके बाद वर्ष 2009 में झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी रद्द करते हुए सीसीएल को तीन महीने के भीतर नई विभागीय कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया था. हालांकि कंपनी ने वर्षों तक इस आदेश का पालन नहीं किया. आखिरकार 15 जनवरी 2015 को उन्हें सेवा में बहाल किया गया और उसी वर्ष 30 नवंबर को वे सेवानिवृत्त हो गए.
कर्मचारी को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता
अदालत ने कहा कि बैजनाथ महतो लगातार सेवा में वापसी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने काम करने से इनकार किया था. चूंकि कर्मचारी को नौकरी से दूर रखने के लिए नियोक्ता स्वयं जिम्मेदार था, इसलिए उसे वेतन और अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता.