Jharkhand Delimitation 2026: देश में प्रस्तावित परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर झारखंड के आदिवासी समाज की चिंता बढ़ती जा रही है. पूर्व विधायक और आदिवासी नेता बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन के दौरान आदिवासी क्षेत्रों की एकता किसी भी कीमत पर नहीं टूटनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह केवल सीटों के बंटवारे का मामला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकार और पहचान से जुड़ा मुद्दा है.
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नए सिरे से निर्धारण करना है. यह काम आबादी के आधार पर किया जाता है. वर्ष 2026 के बाद देश में फिर से परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है. इसी वजह से झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में चिंता बढ़ गई है.
2002 का फैसला बना चिंता की वजह
बंधु तिर्की ने कहा कि साल 2002 में भी आदिवासी आरक्षित सीटें घटाने की कोशिश हुई थी. उस समय विधानसभा की अनुसूचित जनजाति सीटों को 28 से 22 और लोकसभा की सीटों को 5 से 4 करने का प्रस्ताव आया था.
इस फैसले के खिलाफ पूरे राज्य में आंदोलन हुआ. लोगों के विरोध के बाद सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा और धारा 108B लागू कर सीटों में कटौती पर रोक लगाई गई.
2026 के बाद क्यों है खतरे की आशंका?
आदिवासी संगठनों का कहना है कि अगर इस बार परिसीमन सिर्फ आबादी के आधार पर हुआ तो झारखंड को नुकसान हो सकता है.
इसके पीछे कई वजह बताई जा रही हैं. बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन कर जाते हैं. जंगल और पहाड़ी इलाकों में आबादी का घनत्व शहरों की तुलना में कम है. वहीं खनन और बड़ी परियोजनाओं के कारण कई गांव उजड़ चुके हैं.
आदिवासी समाज ने रखीं चार बड़ी मांगें
आदिवासी समाज ने मांग की है कि अभी की 28 विधानसभा और 5 लोकसभा की अनुसूचित जनजाति सीटों में किसी तरह की कमी नहीं की जाए.
यदि भविष्य में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है तो एसटी सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए.
परिसीमन करते समय केवल आबादी नहीं, बल्कि जंगल, पहाड़ी क्षेत्र, विस्थापन और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को भी आधार बनाया जाए.
साथ ही संविधान में ऐसा प्रावधान किया जाए कि परिसीमन के नाम पर आदिवासी आरक्षित सीटों में कभी कटौती न हो सके.