Current News: सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर अहम फैसले में कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने घर में सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ रहने का अधिकार है. अगर बेटे या बहू के घर में रहने से उनके भरण-पोषण या सुरक्षा में बाधा आती है, तो जरूरत पड़ने पर उन्हें संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान और असुरक्षा के साथ जीवन बिताना नहीं है. कोर्ट ने कहा कि एक सभ्य समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ सम्मान और सुरक्षा का व्यवहार करे. यह फैसला लखनऊ निवासी रवि कांत गुप्ता की याचिका पर आया. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके बेटे और बहू को मकान से बाहर करने के एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया गया था.
बुजुर्ग महिला को घर छोड़कर वृद्धाश्रम जाना पड़ा था
मामला लखनऊ के विकास नगर का है, जहां रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय मां रहती थीं. आरोप था कि उनके पोते ने उन्हें अपने ही घर में रहने नहीं दिया, जिसके बाद बुजुर्ग महिला को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा.
मामला प्रशासन के पास पहुंचने के बाद 15 नवंबर 2022 को एसडीएम ने बेटे को मकान से बाहर करने का आदेश दिया. प्रशासन ने माना कि बुजुर्ग महिला को अपने घर में रहने का अधिकार है. इसके बाद बेटे ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन उसे राहत नहीं मिली. 9 अगस्त 2023 को जिला मजिस्ट्रेट ने भी एसडीएम के आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया. इसके खिलाफ दोनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया.
हाईकोर्ट ने कहा था कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं है. इसके आधार पर हाईकोर्ट ने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश रद्द कर दिए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बच्चों या अन्य संबंधित लोगों को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है.