Jharkhand: झारखंड की खनिज संपदा को लेकर रविवार को हजारीबाग में भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाए. प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद झारखंड खनिज से होने वाली आय के मामले में बेहतर स्थिति हासिल नहीं कर पा रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से पत्रकारों ने MMDR बिल के बाद झारखंड के राजस्व और खनिज संसाधनों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल किया था. जवाब में उन्होंने झारखंड और ओडिशा के खनिज भंडार तथा राजस्व के आंकड़ों का उदाहरण दिया.
झारखंड के पास 40 फीसदी खनिज भंडार
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि देश के कुल खनिज भंडार का करीब 40 प्रतिशत झारखंड में है. इसके मुकाबले ओडिशा के पास लगभग 17 प्रतिशत खनिज भंडार बताया जाता है. इसके बावजूद दोनों राज्यों की खनिज आय में बड़ा अंतर दिखाई देता है. उनके मुताबिक, 2025-26 में झारखंड को खनिज क्षेत्र से करीब 18 हजार करोड़ रुपये मिले, जबकि इसी अवधि में ओडिशा की आय लगभग 44 हजार करोड़ रुपये रही.
नई कोयला खदानों को लेकर भी सवाल
मरांडी ने राज्य में खनन गतिविधियों की मौजूदा स्थिति का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि पिछले छह वर्षों में झारखंड में एक भी नई कोयला खदान का आवंटन नहीं हुआ है. बालू के टेंडर को लेकर भी उन्होंने व्यवस्था पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि केवल यह तर्क देना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यवस्था झारखंड के हित में नहीं है. पहले यह देखना जरूरी है कि उपलब्ध संसाधनों से राज्य को अपेक्षित आर्थिक लाभ क्यों नहीं मिल रहा.
खनिज संपदा को आय में बदलने पर जोर
भाजपा नेता ने कहा कि झारखंड के सामने असली चुनौती अपनी खनिज संपदा का प्रभावी इस्तेमाल करने की है. इसके लिए पारदर्शी नीलामी, नए खनन अवसर और बेहतर संसाधन प्रबंधन पर काम करने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि देश में भाजपा शासित कई राज्य हैं, लेकिन सभी राज्यों में खनिज संसाधनों से मिलने वाला राजस्व एक जैसा नहीं है. इसलिए झारखंड को अपनी खनिज संपदा के आधार पर राजस्व बढ़ाने के लिए अलग से प्रभावी रणनीति तैयार करनी होगी.
MMDR बिल के बाद बढ़ी चर्चा
MMDR बिल के बाद झारखंड के खनिज संसाधनों और उनसे मिलने वाले राजस्व को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है. इसी संदर्भ में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मरांडी ने राज्य की मौजूदा खनन व्यवस्था और राजस्व के आंकड़ों को सामने रखा. उन्होंने संकेत दिया कि खनिज संपदा का बड़ा भंडार अपने आप में राज्य की आर्थिक मजबूती की गारंटी नहीं है. संसाधनों के इस्तेमाल, नीलामी और नए खनन अवसरों को बढ़ाकर ही राज्य की आय में सुधार किया जा सकता है.