National Breaking: अहमदाबाद में 12 जून को हुई एयर इंडिया की भीषण विमान दुर्घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि शुरुआती जांच रिपोर्ट में सीधे तौर पर पायलट को दोषी ठहराना दुर्भाग्यपूर्ण है. यह टिप्पणी उस समय आई जब इस मामले को लेकर एक जनहित याचिका पर सुनवाई की गई.
12 जून को अहमदाबाद से लंदन जाने के लिए उड़ान भरने वाला एयर इंडिया का विमान उड़ान भरते ही क्रैश हो गया था. इस दर्दनाक हादसे में विमान में सवार 266 लोगों में से केवल एक यात्री ही जिंदा बचा, जबकि बाकी सभी की मौत हो गई. मृतकों में यात्री, चालक दल और जमीन पर मौजूद लोग शामिल थे. हादसे ने देशभर में एविएशन सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
इस मामले में सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन नामक एनजीओ ने याचिका दायर की थी. एनजीओ की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने पैरवी की. सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) और डीजीसीए (DGCA) को नोटिस जारी किया. अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच में पायलट को जिम्मेदार ठहराने वाली टिप्पणी असमय और अनुचित है.
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मान लीजिए कल यह कहा जाता है कि पायलट A इस हादसे का जिम्मेदार है, तो उसके परिवार और समाज दोनों पर गहरा असर पड़ेगा. जब तक जांच पूरी तरह तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना दुर्भाग्यपूर्ण है.
अदालत ने यह भी कहा कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है. किसी भी जानकारी को टुकड़ों में लीक करना ठीक नहीं है, बल्कि पूरी जांच पूरी होने तक संयम बरतना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सिर्फ इस बात पर जवाब मांगा है कि क्या जांच स्वतंत्र, निष्पक्ष और त्वरित ढंग से चल रही है. अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह यह नहीं कह रही कि रिपोर्ट गलत है, लेकिन जांच के बीच में पायलट को दोष देना उचित नहीं है.
एनजीओ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि हादसे को 100 दिन से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अब तक केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट में न तो हादसे का वास्तविक कारण स्पष्ट किया गया और न ही भविष्य के लिए कोई ठोस सुझाव दिए गए.
याचिकाकर्ता का कहना है कि एएआईबी ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में केवल चुनिंदा जानकारी साझा की है. कई अहम तथ्यों को दबा लिया गया है और पूरा दोष पायलट पर डाल दिया गया है. यह भी संभव है कि दुर्घटना विमान की तकनीकी खामी या बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर के निर्माण दोष के कारण हुई हो. जरूरी निरीक्षणों की कमी भी एक अहम वजह हो सकती है, जिसे नजरअंदाज किया गया. सबसे अहम बात यह है कि इस जांच में एकमात्र जीवित बचे यात्री की गवाही तक शामिल नहीं की गई.
याचिका में जांच टीम की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए. जांच दल में 5 सदस्य हैं, जिनमें से 3 सदस्य डीजीसीए (एयर सेफ्टी, वेस्टर्न रीजन) से हैं. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह सीधे-सीधे हितों का टकराव है, क्योंकि जांच में डीजीसीए की भूमिका और लापरवाही की भी जांच की जानी चाहिए. ऐसे में डीजीसीए के अधिकारी खुद जांच का हिस्सा नहीं हो सकते.
एनजीओ ने अपनी याचिका में दो प्रमुख मांगें रखी हैं. पहली, हादसे से जुड़े सभी अहम रिकॉर्ड्स, तकनीकी जानकारी, फॉल्ट मैसेज और टेक्निकल एडवाइजरी को सार्वजनिक किया जाए. दूसरी, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच समिति गठित की जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर जांच को लेकर जल्दबाजी में गलत संदेश दिया गया और पायलट को जिम्मेदार ठहरा दिया गया तो इससे जांच की विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ जाएगी. अदालत ने कहा कि अभी यह समय नहीं है कि अधूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए.
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि कोई भी जानकारी जल्दबाजी में जारी न हो. अगर कल यह कहा जाए कि पायलट जिम्मेदार है तो उसके परिवार को भारी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी.
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जांच पूरी होने से पहले पायलट को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. अदालत ने डीजीसीए और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और यह सुनिश्चित करने को कहा है कि जांच स्वतंत्र, निष्पक्ष और तेजी से पूरी हो.
12 जून को हुई इस दुर्घटना में 265 लोगों की जान चली गई थी और अब देश की सर्वोच्च अदालत ने संकेत दिया है कि सच सामने आने तक जल्दबाजी में किसी एक पक्ष को दोष देना न्यायसंगत नहीं होगा.