Ghatshila News: घाटशिला में भाजपा जिला अध्यक्ष चंडी चरण साव द्वारा किए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस के खिलाफ विरोध के स्वर तेज हो गए हैं. भाजपा जिला अध्यक्ष द्वारा कुणाल षड़ंगी पर लगाए गए सवालों को लेकर अब खुद उनके समर्थकों ने कड़ा रुख अपनाया है. विरोध करने वालों का कहना है कि चंडी चरण साव का बयान न केवल अनुचित है बल्कि उस परिवार की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है जिसके साथ वह खुद दशकों तक जुड़े रहे हैं.
विरोध करने वालों ने कहा कि भाजपा जिला अध्यक्ष की यादाश्त ताजा करनी होगी क्योंकि वह जिस परिवार की बात कर रहे हैं, उस परिवार से उनका वर्षों पुराना व्यक्तिगत संबंध रहा है. ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि उन्हें यह जानकारी नहीं कि कुणाल षड़ंगी का अपने चाचा के प्रति कितना प्रेम और सम्मान था. उन्होंने कहा कि सवाल पूछने से पहले थोड़ा अपने चचेरे भाई ऋषि षड़ंगी से भी पूछ लेते कि पिता के प्रति उन्होंने कौन सा दायित्व निभाया.
जानकारी देते हुए कहा गया कि कुणाल षड़ंगी 20 जून 2022, 5 नवंबर 2022, 10 दिसंबर 2022 और 18 दिसंबर 2022 को अपने चाचा के साथ थे. इतना ही नहीं, उन्होंने दिल्ली और मुंबई जाकर चार बार उनकी तबीयत का हालचाल भी जाना था. जब 19 दिसंबर को उनके चाचा का निधन हुआ, तब पार्थिव शरीर को पैतृक आवास तक लाने का कार्य भी खुद कुणाल षड़ंगी ने किया था.
विरोध जताने वालों ने कहा कि सब कुछ जानते हुए भी भाजपा जिला अध्यक्ष ने महज चंपई सोरेन को बचाने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए उस परिवार के खिलाफ बयान दिया जिसने उन्हें न केवल सम्मान बल्कि राजनीतिक पहचान भी दी थी. उन्होंने याद दिलाया कि जब चंडी चरण साव के पुत्र को डेंगू हुआ था और वे परेशान थे, तब पार्टी का कोई नेता या कार्यकर्ता उनके साथ नहीं था. उस वक्त यही परिवार उनके साथ खड़ा रहा. इलाज करवाया, मानसिक रूप से सहारा दिया और उन्हें टूटने नहीं दिया. ऐसे परिवार पर लांछन लगाना यह दिखाता है कि भाजपा जिला अध्यक्ष अब उसी राह पर चल पड़े हैं जिस रास्ते पर चंपई सोरेन हैं.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठे सवालों के जवाब देते हुए कहा गया कि चंपई सोरेन से पूछा जाना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही, ऐसी कौन सी कमी थी कि वे दिल्ली स्थित सर गंगा राम अस्पताल नहीं पहुंचे, जहां उनके राजनीतिक साथी और गुरुजी भर्ती थे. जो व्यक्ति एक चश्मा बनवाने के लिए दिल्ली जा सकता है, वह अपने उस साथी का हाल जानने नहीं गया जिसके साथ उसने झारखंड आंदोलन का सफर शुरू किया था.
विरोध करने वालों ने कहा कि जिस गुरुजी ने अपने पुत्र और पुत्रवधू को दरकिनार कर चंपई सोरेन को राज्य का मुखिया बनाया, क्या उनके प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं था? पार्टी बदलकर उन्होंने अपना मतभेद तो जाहिर किया, लेकिन इतनी शत्रुता क्यों कि व्यक्तिगत संबंध भी निभा नहीं पाए?
उन्होंने सवाल किया कि जिस स्व रामदास सोरेन को चंपई सोरेन ने कई सार्वजनिक मंचों से अपना छोटा भाई कहा, क्या वे कभी उनके घोड़ाबांधा स्थित आवास पर गए? क्या उन्होंने शोकाकुल परिवार से मिलकर ढांढस बंधाया? जिस गुरुजी को देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि दी, क्या चंपई सोरेन ने भी मरणोपरांत वही सम्मान दिखाया?
विरोधियों का कहना है कि सवाल सीधा था लेकिन घाटशिला की भाजपा टीम ने जवाब देने के बजाय जलेबी की तरह गोल-गोल बातें कीं. सरायकेला जिले में भी कुछ नेताओं ने कुणाल षड़ंगी के खिलाफ घटिया टिप्पणी की, जिनके बारे में कहा गया कि चाटुकारिता और अवसरवाद उनके डीएनए में है. उन्होंने चुनौती दी कि वे खुद दिल पर हाथ रखकर बताएं कि उन्होंने कितनी बार किसी के स्कूल, कॉलेज या अस्पताल के मामलों में मदद की या किसी की पैरवी की.
अंत में विरोध जताने वालों ने कहा कि अगर बात निकली तो दूर तलक जाएगी. उन्होंने सवाल उठाया कि चंपई सोरेन किस मुंह से आदिवासी मूलवासी के हक की बात करते हैं. आज वे केवल पुत्र मोह में पड़े उस धृतराष्ट्र की तरह हैं जिनके कारण महाभारत जैसी लड़ाई हुई थी.