Jamshedpur News: जमशेदपुर से एक चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां चुनावी प्रक्रिया से जुड़े एक आवेदन को लेकर पत्रकार और जिला सूचना संपर्क विभाग के कर्मचारी के बीच विवाद गहराता जा रहा है. पत्रकार अविनाश कुमार ने आरोप लगाया है कि उन्होंने चुनाव में वोटिंग और काउंटिंग के लिए जिला सूचना संपर्क विभाग में आवेदन जमा करने की कोशिश की, लेकिन वहां तैनात कथित असिस्टेंट एपीआरओ अंकित कुमार ने उनका आवेदन स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया. मामला यहीं नहीं रुका, पत्रकार का दावा है कि बाद में अंकित कुमार ने उन्हें फोन कर धमकी तक दी.
पत्रकार ने बताया कि जब उन्होंने जिला सूचना अधिकारी पंचानन से बातचीत की और पूछा कि क्या विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी सरकारी आदेशों पर फैसला लेने के अधिकार रखते हैं, तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला. उन्होंने कहा कि उन्होंने आवेदन जिला सूचना पदाधिकारी के नाम से दिया था, फिर भी असिस्टेंट एपीआरओ अंकित कुमार ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया और खुद को विभाग का मालिक समझते हुए बदतमीजी की.
अविनाश कुमार ने बताया कि अंकित कुमार ने उन्हें फोन पर धमकी भरे लहजे में कहा, "तुम जो पत्रकार बन रहा ना, दो मिनट में बता देंगे, तुम आओ ऑफिस में." पत्रकार का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्तिगत धमकी नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की गरिमा पर सीधा हमला है. उन्होंने कहा कि अगर उनके साथ किसी तरह की अनहोनी होती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी अंकित कुमार और जिला सूचना संपर्क विभाग की होगी.
पत्रकार ने प्रशासन से सुरक्षा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है. उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला किसी एक व्यक्ति की बदसलूकी नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था के भीतर मौजूद उस मानसिकता को उजागर करता है, जो सत्ता के छोटे-से पद पर बैठकर भी पत्रकारों को दबाने और डराने की कोशिश करती है.
स्थानीय पत्रकार संगठनों ने भी इस घटना पर नाराजगी जताई है और जिला प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है. उनका कहना है कि चुनाव के समय जब मीडिया की भूमिका सबसे अहम होती है, तब विभागीय अधिकारी अगर इस तरह की दबंगई दिखाएं तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बेहद खतरनाक संकेत है.
यह घटना सिर्फ एक धमकी का मामला नहीं बल्कि प्रेस स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वाला उदाहरण है. पत्रकार लोकतंत्र की आंख और कान होते हैं, और जब किसी सरकारी विभाग का कर्मचारी उन्हें धमकाने की कोशिश करे, तो यह सत्ता के भीतर व्याप्त अहंकार और असंवेदनशीलता का प्रतीक बन जाता है. यह वही सिस्टम है जहां छोटे अधिकारी भी खुद को मालिक समझने लगते हैं और नागरिकों के अधिकारों को रौंदने से नहीं हिचकिचाते.
रांची से लेकर जमशेदपुर तक सरकारी कार्यालयों में पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार के कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने ऐसे लोगों के हौसले बढ़ा दिए हैं. अब जबकि मामला सीधे धमकी तक पहुंच चुका है, तो जिला प्रशासन को इसे महज “व्यक्तिगत विवाद” मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह एक पत्रकार की सुरक्षा से जुड़ा मामला है, और हर पत्रकार की सुरक्षा लोकतंत्र की सुरक्षा से जुड़ी है. अगर प्रशासन अब भी खामोश रहा, तो यह चुप्पी भविष्य में कई और आवाजों को खामोश कर सकती है.