ब्लैक राइस को दुनिया भर में फॉरबिडन राइस यानी प्रतिबंधित चावल के नाम से जाना
ब्लैक राइस को दुनिया भर में फॉरबिडन राइस यानी प्रतिबंधित चावल के नाम से जाना जाता है। इसका उद्भव चीन और पूर्वोत्तर भारत के असम, मणिपुर और नागालैंड क्षेत्रों में हुआ माना जाता है। प्राचीन चीन में इसे राजघरानों तक सीमित रखा गया था क्योंकि यह अत्यधिक पौष्टिक और दुर्लभ था।
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार ब्लैक राइस में एंथोसाइनिन नामक तत्व पाया जाता
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार ब्लैक राइस में एंथोसाइनिन नामक तत्व पाया जाता है जो इसे काला रंग देता है और शरीर में एंटीऑक्सीडेंट, कैंसर-रोधी, और हृदय-सुरक्षात्मक गुण प्रदान करता है। यह सामान्य चावल की तुलना में पाँच गुना अधिक फाइबर, प्रोटीन और खनिज तत्व प्रदान करता है। नियमित सेवन से यह मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मददगार होता है।
शंकर मार्डी ने बताया कि यह खेती पूरी तरह देशी और जैविक पद्धति से की जा रही
शंकर मार्डी ने बताया कि यह खेती पूरी तरह देशी और जैविक पद्धति से की जा रही है। उद्देश्य केवल लाभ नहीं बल्कि स्वस्थ समाज की ओर एक कदम है। यदि यह सफल हुआ तो गांव के कई किसान ब्लैक राइस की खेती शुरू करेंगे। आर्थिक दृष्टि से यह फसल किसानों के लिए काला सोना साबित हो सकती है। जहाँ सामान्य धान 25-30 रुपये प्रति किलो बिकता है, वहीं ब्लैक राइस की अंतरराष्ट्रीय कीमत 800 रुपये से 1000 रुपये प्रति किलो तक होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झारखंड में इस फसल को सरकारी सहायता
इसे जापान, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में हेल्थ फूड, एनर्जी ड्रिंक और कॉस्मेटिक उत्पादों में प्रयोग किया जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झारखंड में इस फसल को सरकारी सहायता और बाजार संपर्क मिले तो यह राज्य की जैविक कृषि को वैश्विक पहचान दिला सकता है। ब्लैक राइस न केवल किसानों की आर्थिक उन्नति की नई राह खोलेगा, बल्कि झारखंड को भारत के सुपरफूड हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम होगा।