Big Breaking: ट्रंप प्रशासन ने महीनों की सख्ती के बाद अचानक यू टर्न लेते हुए भारत की चाय, कॉफी, मसाले, ट्रॉपिकल फ्रूट्स और फ्रूट जूस जैसे उत्पादों पर लगाया गया 50 फीसदी रेसिप्रोकेल टैरिफ वापस ले लिया है. वाणिज्य मंत्रालय ने 17 नवंबर को इसकी पुष्टि की. डीजीएफटी ने कहा कि इस फैसले से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में लेवल प्लेइंग फील्ड मिलेगी और उनकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.
9 हजार करोड़ रुपयों का निर्यात अब पूरी तरह टैक्स फ्री
वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका को भारत का कुल कृषि निर्यात 2.5 अरब डॉलर था जिनमें से 9 हजार करोड़ रुपयों का निर्यात अब पूरी तरह टैक्स फ्री होगा. अमेरिका ने यह टैरिफ रूस से भारत की तेल खरीद पर आपत्ति जताते हुए लगाया था लेकिन घरेलू महंगाई बढ़ने के दबाव में ट्रंप प्रशासन को शुल्क हटाने का फैसला लेना पड़ा.
ट्रंप ने शुक्रवार को आदेश पर हस्ताक्षर किए
ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर बीफ, कॉफी और कई फलों सहित दर्जनों कृषि उत्पादों पर लगे टैरिफ खत्म कर दिए. इसके पीछे वहां बढ़ती महंगाई को मुख्य कारण बताया गया. अमेरिकियों की मासिक लागत में औसतन 9 हजार से लेकर 66 हजार रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है. द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच खाद्य पदार्थों की कीमतें 2.7 फीसदी बढ़ीं. बीफ और केले की कीमतें सात फीसदी तक बढ़ गईं. प्रशासन का तर्क है कि टैरिफ का भार सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ रहा था इसलिए इन्हें हटाना जरूरी था.
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील लगभग तैयार
भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड बातचीत अब अंतिम चरण में बताई जा रही है. वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि 25 फीसदी रेसिप्रोकेल टैरिफ और कच्चे तेल पर अतिरिक्त ड्यूटी जैसे अहम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहमति लगभग बन चुकी है. फरवरी से जारी बातचीत में जल्दी ही अंतिम समझौते की उम्मीद है.
भारत की अमेरिका को बड़ी सप्लाई
वित्त वर्ष 2025 में भारत ने 86.51 अरब डॉलर यानी करीब 7 लाख 66 हजार करोड़ रुपये का सामान अमेरिका भेजा. इनमें वस्त्र, ज्वेलरी और इंजीनियरिंग गुड्स जैसी शीर्ष पांच कैटिगरी का निर्यात 60 अरब डॉलर से अधिक रहा. सरकार का अनुमान है कि 48.2 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ लागू थे जिनमें अब बड़ी राहत मिलेगी.
टैरिफ विवाद के बीच पहली ऊर्जा डील
टैरिफ मामले के बीच भारत और अमेरिका ने पहली बड़ी ऊर्जा डील भी साइन की है. इसके तहत भारत अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी खरीदेगा जो देश की सालाना जरूरत का दस फीसदी है. यह डील एक वर्ष यानी 2026 के लिए मान्य रहेगी. इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल ने चेवरॉन, फिलिप्स 66 और टोटल एनर्जी जैसी अमेरिकी कंपनियों से सप्लाई का करार किया है.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का आधा एलपीजी आयात करता है. अभी अधिकांश सप्लाई पश्चिम एशिया से आती है. नई डील से सोर्सिंग में विविधता आएगी और सप्लाई चेन स्थिर होगी.
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती
यह डील भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी. पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता कम होगी. वैश्विक कीमतों में उतार चढ़ाव का असर सीमित होगा और अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन सुधारने में मदद मिलेगी. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस करार को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि भारत एलपीजी सोर्सिंग को विविध कर रहा है ताकि उपभोक्ताओं को सुरक्षित और सस्ता एलपीजी मिल सके.
क्या गैस सिलेंडर सस्ते होंगे
डील में सीधे तौर पर गैस सिलेंडर की कीमतें कम करने का प्रावधान नहीं है लेकिन स्थिर सप्लाई से कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है. पिछले वर्ष वैश्विक एलपीजी कीमतें 60 फीसदी तक बढ़ीं थीं लेकिन सरकार ने उज्ज्वला लाभार्थियों को सिर्फ 500 से पांच सौ 550 रुपये प्रति सिलेंडर के आसपास भुगतान करवा कर बड़े स्तर पर राहत दी थी.
अमेरिका का यह यू टर्न वैश्विक आर्थिक दबाव का नतीजा है. ट्रंप प्रशासन घरेलू महंगाई से जूझ रहा है और खाद्य पदार्थों की कीमतें राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा हैं. ऐसे में भारत पर लगाए गए टैरिफ हटाना वहां की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं दोनों के लिए लाभकारी कदम माना जा रहा है. भारत के लिए यह बड़ी राहत है क्योंकि कृषि निर्यात में अमेरिकी बाजार अहम भूमिका निभाता है. ऊर्जा डील बताती है कि दोनों देशों के बीच भरोसा बना हुआ है और व्यापारिक रिश्ते नए आयाम ले रहे हैं. हालांकि दीर्घकाल में यह देखना होगा कि नई ट्रेड डील भारत के विनिर्माण और घरेलू बाजार पर क्या प्रभाव डालती है.