Big News: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों को नक्सल मोर्चे पर भारी सफलता मिली है. शनिवार को कुल 37 नक्सलियों ने पुलिस के सामने हथियार डाल दिए. इनमें 12 महिलाएं शामिल हैं. इन सभी पर मिलाकर 65 लाख रुपये का इनाम घोषित था. वर्षों तक जंगलों में सक्रिय रहे ये माओवादी अब हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला कर चुके हैं. पुलिस इसे बस्तर में शांति बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम मान रही है.
सरेंडर कार्रवाई दंतेवाड़ा डीआरजी कार्यालय में वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पूरी की गई. डीआरजी, बस्तर फाइटर्स, विशेष आसूचना शाखा और सीआरपीएफ की 111वीं और 230वीं बटालियन की संयुक्त रणनीति इस अभियान की बड़ी ताकत रही. सरकार ने पुनर्वास नीति के तहत सभी सरेंडर करने वालों को तुरंत 50 हजार रुपये की सहायता राशि उपलब्ध कराई है. इनके लिए स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग, खेती के लिए जमीन और सुरक्षित आवास जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं.
मिनपा हमले में 26 जवानों की शहादत के मामले से जुड़ा भीमा भी शामिल
सरेंडर करने वालों में कई ऐसे नाम हैं जो लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए थे. इनमें कंपनी नंबर 2 का सदस्य भीमा उर्फ जहाज सबसे बड़ा नाम है. यह 2020 में मिनपा हमले में शामिल था. इस हमले में 26 जवान शहीद हुए थे. सरेंडर सूची में 8 लाख रुपये के इनामी कुमली उर्फ अनिता मंडावी, गीता उर्फ लख्मी और रंजन मंडावी भी शामिल हैं. इनके अलावा 5 लाख और 2 लाख रुपये के इनामी नक्सली भी सरेंडर करने वालों में हैं जो संगठन की अलग अलग गतिविधियों में सक्रिय थे.
लोन वर्राटू अभियान का असर जारी
दंतेवाड़ा पुलिस लंबे समय से लोन वर्राटू अभियान चला रही है. इसका अर्थ है घर लौट आइए. पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 20 महीनों में 165 इनामी नक्सलियों सहित कुल 508 माओवादी सरेंडर कर चुके हैं. इस बार सरेंडर करने वालों में क्रांति उर्फ पोदिये और हुंगी जैसी महिला नक्सली भी शामिल हैं जो 2024 की मुठभेड़ों में सक्रिय थीं. अब तक कुल 1160 माओवादी इस अभियान के तहत हथियार छोड़ चुके हैं. पुलिस का कहना है कि संदेश साफ है कि हिंसा छोड़ने वालों को सुरक्षा और सम्मान दोनों दिए जाएंगे.
दंतेवाड़ा में एक साथ 37 नक्सलियों का सरेंडर नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों और प्रशासन की बढ़ती पकड़ का संकेत है. इनाम घोषित माओवादियों का सामने आना यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर भरोसा और संसाधनों की कमी तेज हुई है. पुनर्वास नीति और लोन वर्राटू जैसे कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर प्रभाव दिखा रहे हैं. हालांकि नक्सली समस्या पूरी तरह समाप्त होने में अभी समय लगेगा क्योंकि छोटे समूह अभी भी सक्रिय हैं. लेकिन यह सरेंडर बताता है कि जंगलों में सशस्त्र माओवाद की पकड़ कमजोर हो रही है और मुख्यधारा में लौटने की प्रक्रिया लगातार मजबूत हो रही है.