Bengal Politics: बिहार विधानसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं. नतीजों में एनडीए को बड़ी जीत मिली है. भाजपा ने 89 सीटें हासिल कीं और जदयू 85 पर रही. नई सरकार बन गई है और नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री के तौर पर क़मान संभाल चुके हैं. इस जीत के पीछे संगठन और उम्मीदवारों की मेहनत के साथ एक और कारण की चर्चा हो रही है जिसे राजनीतिक हलके “बाबा फैक्टर” कह रहे हैं.
पिछले कुछ वर्षों से चर्चा में है धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री
धार्मिक नेताओं की भूमिका भारतीय राजनीति में हमेशा बहस का मुद्दा रही है. बागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री पिछले कुछ वर्षों में इस चर्चा के केंद्र में रहे हैं. कोरोना काल के दौरान वे राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगे और अब हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व के सवालों पर खुलकर बोल रहे हैं. इसी वजह से विपक्ष उन पर भाजपा की रणनीति से जुड़े होने का आरोप लगाता रहा है.
7 दिसंबर को धीरेन्द्र शास्त्री पहुंचे कोलकाता
बंगाल में भी उनकी सक्रियता बढ़ी है. 6 दिसंबर को जहां मुर्शिदाबाद में पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखकर विवाद खड़ा किया, वहीं 7 दिसंबर को धीरेन्द्र शास्त्री कोलकाता पहुंचे. उनकी कथा पहले से तय थी लेकिन उनके आगमन से राजनीतिक सरगर्मी अचानक तेज हो गई है. मंच पर साध्वी ऋतंभरा, अयोध्या हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. राज्यपाल सीवी आनंद बोस की मौजूदगी ने भी इस आयोजन को राजनीतिक रंग दिया.
बिहार चुनाव से पहले शास्त्री ने कई जिलों में किए कार्यक्रम
सवाल यह है कि क्या यह बिहार में शास्त्री की भूमिका की पुनरावृत्ति है. बिहार चुनावों से पहले उनकी गतिविधि चरम पर थी. उन्होंने कई जिलों में कार्यक्रम किए और खुद को हिंदू एकता के पक्षधर के रूप में पेश किया. भाजपा नेतृत्व के साथ उनकी नजदीकी का संकेत तब मिला जब फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छतरपुर में उनके द्वारा बनवाए जा रहे कैंसर अस्पताल की नींव रखने पहुंचे और उन्हें छोटा भाई कहकर संबोधित किया.
अपने आप को सभी वर्गों की नेता साबित करती हैं ममता बनर्जी
धर्म और राजनीति का टकराव पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से ही संवेदनशील विषय रहा है. ममता बनर्जी अपने आप को सभी वर्गों की नेता साबित करती हैं जबकि धीरेन्द्र शास्त्री हिंदू वोट में एकता की अपील करते हैं. भाजपा के लिए यह माहौल अनुकूल बनाने वाली रणनीति साबित हो सकती है. बिहार में हिंदू वोट का ध्रुवीकरण एनडीए को लाभ पहुंचाने वाला कारक माना गया. वहां एनडीए को 202 सीटें मिलीं और महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया.
हिंदू एकता का संदेश, घुसपैठ और धर्मांतरण
शास्त्री के बिहार मॉडल में तीन बातें साफ दिखीं. हिंदू एकता का संदेश, घुसपैठ और धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर मुखर बयान और लोकल भाजपा नेताओं के साथ साझा मंच. इससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा और इसका असर चुनाव परिणामों में दिखा. बिहार में एनडीए की जीत में हिंदू वोट की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत मानी जाती है.
धीरेन्द्र शास्त्री की बंगाल में बढ़ती सक्रियता को केवल धार्मिक गतिविधि मानना मुश्किल है. बिहार की तरह यहां भी उनका मंच राजनीतिक संकेत देता है. भाजपा के लिए यह एक महत्वपूर्ण चेहरा साबित हो सकता है जबकि टीएमसी इसे चुनौती के रूप में देख रही है. आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या बंगाल में भी बिहार वाला प्रभाव दोहराया जा सकता है या यह केवल प्रतीकात्मक सक्रियता है.