Jamshedpur: दलमा की तराई इन दिनों खजूर के गुड़ की सोंधी महक से महक रही है। सर्दी का मौसम शुरू होते ही पश्चिम बंगाल के बांकुरा ज़िले के कारीगर हर साल की तरह इस क्षेत्र में पहुंच जाते हैं और करीब तीन महीने तक यहां प्रवास करते हैं। कड़कड़ाती ठंड में सूर्योदय से पहले वह खजूर के पेड़ों से नीरा निकालते हैं और लगभग छह घंटे की मेहनत के बाद ताज़ा गुड़ तैयार कर बेचते हैं।
कारीगर 2 तरह के गुड बनते है
यह कारीगर दो तरह का गुड़ बनाते हैं। पहला तरल (गीला) गुड़ और दूसरा चक्की (पटाली) गुड़। दोनों ही प्रकार का गुड़ शुगर-फ्री माना जाता है और शरीर को गर्म रखने में मदद करता है। इसका स्वाद और सेहत दोनों ही लोगों को आकर्षित करते हैं, इसलिए शहर से भी लोग इसे खरीदने पहुंचते हैं।
पांच कारीगरों की एक टीम दलमा की तराई पहुंची
खजूर के गुड़ की बढ़ती लोकप्रियता का असर यह है कि हर साल यहां आने वाले कारीगरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इस वर्ष भी पांच कारीगरों की एक टीम दलमा की तराई में पहुंच चुकी है। टाटा-कटिंग रोड के किनारे ये कारीगर गुड़ बनाते और बेचते हुए आसानी से दिख जाते हैं।
कैसे रूपये किलो गुड जानें
जानकार बताते हैं कि दलमा की तराई में खजूर के पेड़ों की संख्या अधिक होने और बाज़ार की अच्छी उपलब्धता के कारण कारीगर हर साल इस क्षेत्र का रुख करते हैं। यहां तरल गुड़ 100 रुपये प्रति किलो और पटाली गुड़ 120 रुपये प्रति किलो की दर से मिलता है। स्वाद और सेहत से भरपूर इस शुगर-फ्री गुड़ को खरीदने लोग बड़े शौक ही से यहां पहुंचते हैं।