National News: लोकसभा के शीतकालीन सत्र में बुधवार का दिन चुनाव सुधारों पर चर्चा के नाम रहा लेकिन बहस शुरू होते ही सदन का माहौल गर्म हो गया. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब अपनी बात रखने खड़े हुए तो शुरुआत उन्होंने खादी और वस्त्रों के उदाहरण से की. राहुल ने कहा कि जैसे किसी कपड़े में हर धागे का महत्व समान होता है वैसे ही देश का हर नागरिक बराबरी रखता है. उन्होंने असमिया गमछे और कांचीपुरम साड़ी का उदाहरण देते हुए खादी को भारत की आत्मा बताया.
देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति एक ही विचारधारा वाले: राहुल गांधी
बात आगे बढ़ी तो राहुल ने माहौल को और तीखा कर दिया. उनका कहना था कि समानता की यह भावना कुछ संगठनों को रास नहीं आती. राहुल ने दावा किया कि देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति एक ही विचारधारा से आते हैं और संस्थानों पर धीरे-धीरे दबदबा बढ़ाया जा रहा है. उनके इस बयान पर सत्ता पक्ष ने कड़ा एतराज जताया. इसके बाद सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया और सांसदों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली.
चुनाव आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि आयोग और सरकार के बीच असामान्य तालमेल दिखाई देता है. राहुल का दावा था कि हरियाणा और कर्नाटक के चुनावों में गड़बड़ियों के सबूत उनकी पार्टी सामने ला चुकी है. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में किए गए बदलावों का हवाला देते हुए कहा कि नियम इस तरह बदले गए ताकि चुनाव व्यवस्था पर नियंत्रण रखा जा सके. राहुल ने यह भी कहा कि शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में ऐसे संशोधन किए गए जिनसे किसी आयुक्त को जवाबदेह ठहराना मुश्किल हो जाए.
राहुल चर्चा के विषय से भटक कर समय नष्ट कर रहे: किरेन रिजिजू
सत्ता पक्ष ने इन आरोपों पर कड़ा विरोध जताया. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि राहुल चर्चा के विषय से भटक कर समय नष्ट कर रहे हैं. इसी बीच स्पीकर ओम बिरला ने भी हस्तक्षेप किया. उन्होंने राहुल को चेतावनी देते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष होने का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी बात कही जा सकती है. स्पीकर ने उन्हें स्पष्ट निर्देश दिया कि वे किसी संगठन का नाम न लें और चर्चा को चुनाव सुधार के दायरे में ही रखें.
सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ रही खाई
सदन में हुई इस बहस ने सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ती खाई को एक बार फिर उजागर कर दिया. राहुल के आरोपों ने राजनीतिक तापमान बढ़ाया तो स्पीकर की नसीहत ने साफ संकेत दिया कि चुनाव सुधार जैसे गंभीर विषय पर भी संसद में संवाद आसान नहीं रह गया है. विपक्ष चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल खड़ा कर रहा है जबकि सरकार इसे राजनीतिक बयानबाजी मानती है. आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और व्यापक बहस को जन्म दे सकता है.