इस भीषण नरसंहार में पहाड़ी खून से लाल हो गई थी। पास से बहने वाली ताजना नदी की सहायक धारा भी शहीदों के रक्त से लाल बताई जाती है। इतिहासकारों और आदिवासी समाज के अनुसार यह नरसंहार जलियांवाला बाग से भी अधिक क्रूर था, लेकिन आज भी मुख्यधारा के इतिहास में इसे वह स्थान नहीं मिला, जिसका यह हकदार है।
उलगुलान और अबुआ दिशुम, अबुआ राज का नारा
धरती आबा बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चल रहा उलगुलान (महान विद्रोह) ब्रिटिश हुकूमत और जमींदारी व्यवस्था की नींव हिला चुका था। मुंडा सहित अन्य आदिवासी समुदाय “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” का उद्घोष कर रहे थे। अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण से त्रस्त हजारों आदिवासी तीर-धनुष लेकर डोम्बारी बुरू पर एकत्र हुए। उन्हें मृत्यु का भय था, लेकिन गुलामी स्वीकार करना उनके स्वाभिमान के विरुद्ध था।
बिना चेतावनी बरसी गोलियां
ब्रिटिश गुप्तचरों की सूचना पर सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। बिना किसी चेतावनी के गोलियां और तोपें दाग दी गईं। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग—कोई भी इस बर्बरता से नहीं बच सका। आधुनिक हथियारों के सामने पारंपरिक तीर-धनुष बेबस साबित हुए। पहाड़ी पर सैकड़ों शव बिछ गए।
ब्रिटिश दस्तावेजों में इस नरसंहार में महज 11-12 मौतों का उल्लेख मिलता है, जबकि समकालीन अखबारों, लोकगीतों और लोककथाओं में हजारों शहीदों की बात कही जाती है। वर्ष 1957 में बिहार सरकार की एक रिपोर्ट में भी लगभग 200 मौतों का अनुमान लगाया गया था।
शहीदों के नाम, जो आज भी चीखते हैं
डोम्बारी बुरू स्थित स्मारक पर कुछ शहीदों के नाम आज भी अंकित हैं, जो उस दौर की क्रूरता की गवाही देते हैं, हाथीराम मुंडा और सिंगराई मुंडा, घायल अवस्था में अंग्रेजों द्वारा जिंदा दफनाए गए।
हाड़ी मुंडा
मझिया मुंडा
बंकन मुंडा की पत्नी
मझिया मुंडा की पत्नी
डुंगन्ग मुंडा की पत्नी
ये नाम सिर्फ व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के संघर्ष और पीड़ा के प्रतीक हैं। अधिकांश शहीद आज भी गुमनाम हैं—उनकी विधवाएं, अनाथ बच्चे और उजड़े परिवार पीढ़ियों से उस दर्द को ढोते आ रहे हैं।
धरती आबा और अधूरा न्याय
इस हमले में बिरसा मुंडा किसी तरह बच निकले थे, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार कर रांची जेल में बंद किया गया, जहां उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गई। धरती आबा के रूप में पूजे जाने वाले बिरसा मुंडा के साथ-साथ उनके हजारों अनुयायियों का बलिदान इतिहास के पन्नों से लगभग मिटा दिया गया।
आज भी जीवित है संघर्ष की स्मृति
आज डोम्बारी बुरू पर 110 फीट ऊंचा शहीद स्तंभ खड़ा है और नीचे धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित है। हर वर्ष 9 जनवरी को यहां शहादत दिवस मनाया जाता है। हजारों आदिवासी श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं, मेला लगता है, लेकिन आंखों से बहने वाले आंसू आज भी नहीं थमते।
डोम्बारी बुरू केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज के आदिवासी संघर्ष का जीवंत प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि देश की आज़ादी की कीमत कितनी भारी थी—और उस कीमत का सबसे बड़ा हिस्सा आदिवासी समाज ने चुकाया।