सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मिली नैतिक जीत
सरयू राय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी उनके द्वारा पहले व्यक्त किए गए विचारों को सही साबित करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस विनियमन को पूरी तरह वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि यह शैक्षणिक संस्थानों में वास्तविक सुधार लाने के बजाय भ्रम पैदा करने वाला अधिक है।
विनियमन को बताया नख-दंत विहीन
गौरतलब है कि सरयू राय ने पहले भी इस नीति की कड़वी आलोचना की थी। उन्होंने अपने पुराने बयानों को दोहराते हुए कहा कि, यूजीसी का यह विनियमन अनावश्यक भ्रम फैलाने वाला है। इसकी प्रस्तावना और उद्देश्यों का इसके प्रावधानों के साथ कोई मेल नहीं है। यह बेहद हड़बड़ी में तैयार किया गया है, जो उच्च शिक्षा में समानता लाने के बजाय असमानता को और बढ़ावा दे सकता है। विधायक ने इसे नख-दंत विहीन बताते हुए सुझाव दिया था कि यूजीसी को इसे तत्काल प्रभाव से वापस ले लेना चाहिए।
व्यावहारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता
राय के अनुसार, शिक्षण संस्थानों में समानता और समता संवर्धन के लिए केवल कागजी नियमों की नहीं, बल्कि एक अग्रसोची और व्यावहारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उच्च शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कोई भी नया नियम लागू करने से पहले उसके जमीनी प्रभावों का गहन अध्ययन जरूरी है। सरयू राय का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि वे शिक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की विसंगति को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया रोक ने अब इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है।