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  • 2026-05-30

Jharkhand News: "आदिवासी बनाम वनवासी" जंग में कूदे पूर्व सीएम चंपई सोरेन, बोले:-"धर्मांतरण आदिवासियों के अस्तित्व के लिए खतरा, चर्चों की जमीन की हो जांच"

Jharkhand News: झारखंड में आदिवासी और वनवासी शब्दों को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपई सोरेन ने धर्मांतरण, आदिवासी संस्कृति और आरक्षण के मुद्दे पर विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया पर जारी अपने लंबे वक्तव्य में उन्होंने झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में चर्चों की बढ़ती संख्या, धर्मांतरण और आदिवासी परंपराओं पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।

चंपई सोरेन ने कहा कि उनके चर्चों की बढ़ती संख्या संबंधी बयान के बाद कई लोगों ने सवाल उठाया कि उन्होंने मंदिरों का उल्लेख क्यों नहीं किया। इस पर उन्होंने कहा कि झारखंड के अधिकांश गांवों में आदिवासी और मूलवासी समुदाय लंबे समय से साथ रहते आए हैं। गांवों में जहां सरना स्थल, जाहेरस्थान, देशाउली और मांझी थान जैसे आदिवासी आस्था केंद्र मौजूद हैं, वहीं सनातन समाज के मंदिर भी हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों पर सम्मानपूर्वक जाते हैं और एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में भी भाग लेते हैं, लेकिन इससे किसी की मूल धार्मिक पहचान या जीवनशैली नहीं बदलती।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट जीवनशैली, परंपराएं और सामाजिक व्यवस्था है। जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु जैसे जीवन के महत्वपूर्ण संस्कार मांझी, परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा और पड़हा राजा जैसे पारंपरिक सामाजिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संपन्न होते हैं। आदिवासी समाज अपने धार्मिक स्थलों पर जाकर मरांग बुरु और सिंगबोंगा की पूजा करता है और हजारों वर्षों से यही परंपरा चली आ रही है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि आदिवासी और मूलवासी समाज के बीच सदियों पुराने सह-अस्तित्व के बावजूद कभी किसी ने सहायता, सहयोग या किसी अन्य माध्यम से आदिवासियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित या बाध्य नहीं किया। उन्होंने कहा कि सनातन समाज के लोग स्वयं को आदिवासी बताकर आरक्षण या अन्य संवैधानिक अधिकारों पर दावा भी नहीं करते, इसलिए उनके साथ किसी प्रकार का टकराव नहीं है।

चंपई सोरेन ने कहा कि झारखंड में ईसाई मिशनरियों ने वर्ष 1845 से धर्म प्रचार का कार्य शुरू किया था और बीते लगभग 180 वर्षों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया के कारण आदिवासी परंपराओं, भाषाओं, लिपियों और धार्मिक आस्थाओं को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि राज्य के कुछ इलाकों, विशेषकर सिमडेगा सहित कई क्षेत्रों में धर्मांतरण के कारण सरना स्थलों और जाहेरस्थानों पर पूजा करने वालों की संख्या घट गई है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी पारंपरिक संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना से है। उनके अनुसार दुनिया के कई देशों में धर्मांतरण के बाद आदिवासी समुदाय अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान खो चुके हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने लैटिन अमेरिका, केन्या, ब्राजील और प्रशांत द्वीपों की कुछ जनजातियों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पारंपरिक भाषाएं, त्योहार और सामाजिक व्यवस्थाएं धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।

चंपई सोरेन ने कहा कि धर्मांतरण केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि आदिवासी अस्तित्व से जुड़ा विषय है। उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, पोटो हो, टाना भगत और तेलंगा खड़िया जैसे आदिवासी नायकों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि आदिवासी समाज अपनी परंपराओं की रक्षा नहीं करेगा तो भविष्य में उसकी सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी धार्मिक स्थल पर जाने मात्र से किसी का धर्म नहीं बदलता, बल्कि धर्म परिवर्तन के साथ जीवनशैली और धार्मिक आस्था में भी बदलाव आता है। उनके अनुसार आदिवासियों को हिंदू बनाए जाने का आरोप एक गलत नैरेटिव है, जिसका उपयोग धर्मांतरण को उचित ठहराने के लिए किया जाता है।

आरक्षण के मुद्दे पर चंपई सोरेन ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत ईसाई समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है और उनके शैक्षणिक संस्थान भी अल्पसंख्यक संस्थानों के रूप में संचालित होते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा मानता है तो फिर अनुसूचित जनजाति वर्ग को मिलने वाले आरक्षण और अन्य अधिकारों का लाभ लेने का औचित्य क्या है। उन्होंने इस विषय पर डीलिस्टिंग या संविधान के अनुच्छेद 342 में आवश्यक संशोधन की मांग भी दोहराई।

चर्चों के लिए भूमि आवंटन के मुद्दे को उठाते हुए चंपई सोरेन ने कहा कि यह जांच होनी चाहिए कि सीएनटी और एसपीटी एक्ट के तहत आदिवासी भूमि पर चर्चों का निर्माण किन प्रावधानों के तहत हुआ और इसके लिए किस प्रकार की अनुमति ली गई।

आदिवासी-वनवासी विवाद पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदाय आदिवासियों को अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि महात्मा गांधी आदिवासियों को "गिरिजन" कहते थे, जबकि भगवान राम के वनवास से "वनवासी" शब्द की भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। उनके अनुसार किसी नाम से संबोधित किए जाने मात्र से समुदाय की मूल पहचान नहीं बदलती।

चंपई सोरेन ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का भी उल्लेख किया और कहा कि केंद्र सरकार ने आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने के लिए उन्हें यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की बात कही है। उन्होंने इसे आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम बताया।

अपने बयान के अंत में उन्होंने कहा कि यदि धर्मांतरण की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगी तो भविष्य में आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान और सामाजिक संरचना पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की।

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