प्रोबेशन खत्म होते ही शुरू होगी 6 महीने की समय सीमा
सरकार के नए प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि प्रोबेशन अवधि पूरी होने के बाद विभाग प्रमुख को कर्मचारी के कामकाज की समीक्षा करनी होगी. यदि कार्य संतोषजनक पाया जाता है तो उसे नियमित किया जाएगा. वहीं निर्धारित 6 महीने के भीतर कोई निर्णय नहीं होने पर कर्मचारी को स्वतः नियमित मान लिया जाएगा.
8 से 10 साल की देरी पर लगेगा विराम
सरकार के संज्ञान में ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें प्रोबेशन पूरा होने के बावजूद कर्मचारी वर्षों तक नियमित नहीं हो पाए. कई विभागों में यह इंतजार 8 से 10 साल तक पहुंच गया. इससे कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और विभागों में पद भी लंबे समय तक प्रभावित रहे. नए नियम का मकसद इसी समस्या को खत्म करना है.
गंभीर अपराध में सीधे बर्खास्तगी का प्रावधान
संशोधित ड्राफ्ट में अनुशासन से जुड़े नियमों को भी सख्त किया गया है. अब केवल महिला संबंधी अपराध ही नहीं, बल्कि गंभीर श्रेणी के अन्य अपराधों में दोषी पाए जाने वाले सरकारी कर्मचारियों पर भी सीधे सेवा से हटाने की कार्रवाई की जा सकेगी.
दो बच्चों का नियम रहेगा लागू
सरकार ने दो बच्चों से जुड़े मौजूदा नियम को बरकरार रखा है. हालांकि विशेष परिस्थितियों में पहले से दो या उससे अधिक बच्चों वाले कर्मचारियों को निर्धारित अवधि और शर्तों के तहत राहत देने का प्रावधान भी रखा गया है.
निवासी और वरिष्ठता से जुड़े नियमों में भी बदलाव
ड्राफ्ट में कुछ प्रशासनिक संशोधन भी प्रस्तावित किए गए हैं. नियमों में अब अलग राज्यों या देशों के संदर्भ की जगह भारत का निवासी शब्द शामिल किया गया है. वहीं कर्मचारियों की वरिष्ठता तय करने से जुड़े प्रावधानों को भी अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया है.
15 जून तक दे सकते हैं सुझाव और आपत्तियां
सरकार ने इस मसौदे को आम लोगों और कर्मचारियों के सुझावों के लिए सार्वजनिक किया है. शासकीय सेवक, उनके परिवार के सदस्य, संस्थाएं और नागरिक 15 जून तक अपनी राय या आपत्ति दर्ज करा सकते हैं. इसके बाद प्राप्त होने वाले सुझावों पर विचार नहीं किया जाएगा. सरकार सभी प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद अंतिम नियमों को मंजूरी देगी.
मप्र सिविल सेवा नियम 2026 का यह प्रस्ताव सरकारी कर्मचारियों के लंबे समय से लंबित नियमितीकरण की समस्या को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. यदि यह ड्राफ्ट लागू होता है तो कर्मचारियों को समयबद्ध निर्णय का लाभ मिलेगा और विभागीय जवाबदेही भी बढ़ेगी.