इस ज्ञान के माध्यम से ही संभव है।
आचार्य ने कहा कि वर्तमान समय में जब अधिकांश लोग बाह्य आडंबरों में उलझे हैं, शिव ने स्पष्ट किया था कि शरीर को कष्ट देने वाली क्रियाएँ जैसे कठोर तप या दीर्घकालीन उपवास केवल शारीरिक परिश्रम हैं।
उन्होंने कहा, यदि ऐसा होता तो श्रमिक, पशु तथा साधनहीन व्यक्ति सहज ही मोक्ष प्राप्त कर लेते। उन्होंने उपवास के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका शाब्दिक अर्थ है "उप" (निकट) और "वास" (स्थित होना), अर्थात् मन को परमात्मा के निकट स्थिर करना। इस प्रकार, उपवास का वास्तविक स्वरूप मन को सांसारिक विक्षेपों से हटाकर ईश्वरचिंतन में स्थिर करना है।
लक्ष्य में सफलता का दृढ़ विश्वास
आचार्य ने समझाया कि साधकों को बाह्याचार की अपेक्षा आंतरिक साधना पर बल देना चाहिए। शिव ने कहा था कि वे मूर्ख हैं जो अपने हाथ में रखे भोजन को फेंककर दर-दर भटकते हैं। उन्होंने साधकों के लिए छह आवश्यक गुणों का उल्लेख किया जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अपरिहार्य हैं। ये गुण हैं - फलिष्यतीति विश्वासः (लक्ष्य में सफलता का दृढ़ विश्वास), श्रद्धया युक्तम् (लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा), गुरुपूजनम् (गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान), समताभाव (आत्मबोध के पश्चात भी सभी प्राणियों के प्रति समता का भाव), इन्द्रियनिग्रह (इन्द्रियों पर संयम) और प्रमिताहारः (संतुलित और पोषक आहार का सेवन)।
श्रद्धा को परिभाषित करते हुए आचार्य ने कहा कि जब मनुष्य परम सत्य को जीवन का ध्येय बनाकर निःस्वार्थ भाव से उसकी ओर बढ़ता है, तो यही गति श्रद्धा कहलाती है। उन्होंने आगे बताया कि जब पार्वती ने सातवीं योग्यता के विषय में प्रश्न किया, तो भगवान शिव ने कहा "सप्तमं नैव विद्यते" अर्थात् यदि उपर्युक्त छह योग्यताएँ साधक में विकसित हो जाएँ, तो किसी अन्य योग्यता की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस प्रेरणादायी संबोधन ने साधकों को बाह्याचार से हटकर आंतरिक साधना की ओर उन्मुख होने के लिए प्रेरित किया।