H-1B Visa: अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय पेशेवरों को अपने देश लौटने के लिए मनाना आज भी एक कठिन चुनौती बना हुआ है. हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एच-1बी वीजा की फीस में भारी बढ़ोतरी लगभग 1 लाख डॉलर तक ने इस चर्चा को फिर से जीवित कर दिया है कि क्या अब भारत के पास रिवर्स ब्रेन ड्रेन का मौका है यानी वो समय जब विदेशों में बसे काबिल भारतीय अपने देश की ओर रुख करें और देश के विकास में योगदान दें.
एच-1बी वीसा को महंगा करने से उन भारतीय पेशवरों पर कतई फर्क नहीं पड़ने वाला जो अमेरिका की नागरिकता लें चुके है, जैसे गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नाडेला और इनके जैसे अनगितनत उदहारण है. इसके साथ ही ऐसे कई लोग हैं जो कभी भारत छोड़कर आए थे और आज अमेरिका में बड़े बड़े बिजनेस को चला रहें हैं. अमेरिका में लगभग 70 फीसदी होटल्स भारतीय लोगों के हैं या उनका उन होटलों में इन्वेस्टमेंट है.
बहरहाल, कहा जा रहा है कि भारत सरकार अब इन काबिल दिमागों को वापस बुलाने की गंभीर कोशिश में जुटी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी एक अधिकारी ने हाल ही में कहा कि सरकार विदेशों में काम कर रहे भारतीयों को स्वदेश लौटने और भारत की विकास यात्रा में भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. वहीं प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य का मानना है कि एच-1बी वीजा में यह बढ़ोतरी भारत के लिए छुपा हुआ वरदान साबित हो सकती है क्योंकि इससे भारत की वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने की क्षमता बढ़ेगी.
भारत के पास आज यह मौका है कि वह विदेशों में बसे वैज्ञानिकों इंजीनियरों, डॉक्टरों और इनोवेटर्स को वापस बुलाकर देश की प्रगति में शामिल करे. टेक्नोलॉजी, चिकित्सा और इनोवेशन जैसे सेक्टरों में भारत तेजी से बढ़ रहा है लेकिन अभी भी इन क्षेत्रों में लीडरशिप लेवल टैलेंट की भारी कमी है.
कुछ भारतीय ऐसे हैं जिन्होंने अमेरिका में सख्त होती इमिग्रेशन नीतियों और अस्थिर माहौल के कारण वापसी पर विचार शुरू किया है. लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि यह संख्या बेहद सीमित है हजारों भारतीयों को अमेरिका की स्थिर सुविधाएं बेहतर रिसर्च माहौल और सामाजिक सुरक्षा छोड़कर वापस लाना इतना आसान नहीं है.
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू इस मुद्दे पर स्पष्ट राय रखते हैं, वे कहते हैं कि अगर भारत सच में बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन चाहता है तो इसके लिए एक संगठित ठोस और दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत होगी जो अभी दिखाई नहीं देती. उनका कहना है कि सरकार को केवल अपीलें जारी करने से काम नहीं चलेगा, उसे खुद उन लोगों की पहचान करनी होगी जो भारत लौटकर बड़ा योगदान दे सकते हैं. जैसे शीर्ष वैज्ञानिक, टेक प्रोफेशनल, डॉक्टर और उद्यमी यह पहल सिर्फ मंत्रालयों या दफ्तरों से नहीं बल्कि टॉप लेवल लीडरशिप से आनी चाहिए.
भारत से प्रतिभा का पलायन कोई नई कहानी नहीं है इसके पीछे कई पुश फैक्टर्स हैं. थकाऊ नौकरशाही, अस्पष्ट नीतियां, कर नियमों की जटिलता और व्यापार के लिए प्रतिकूल माहौल इन कारणों से कई योग्य भारतीय वर्षों से बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश जा रहे हैं. भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2020 के बाद से पांच लाख से अधिक भारतीय अपनी नागरिकता छोड़ चुके हैं. इतना ही नहीं भारत अब उन शीर्ष पांच देशों में शामिल है जहां करोड़पति और उच्च आय वाले नागरिक सबसे ज्यादा पलायन कर रहे हैं.
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार सच में ब्रेन गेन चाहती है तो उसे एक साथ कई स्तरों पर काम करना होगा. इसमें शामिल है टैक्स कानूनों को आसान और पारदर्शी बनाना रिसर्च और इनोवेशन के लिए विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना स्टार्टअप वीजा या विशेष वापसी प्रोत्साहन जैसी योजनाएं लाना शहरी अव्यवस्था ट्रैफिक और बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना.
संजय बारू का कहना है कि भारत को अपने रिसर्च एजुकेशन और इनोवेशन इकोसिस्टम को अमेरिका की टक्कर का बनाना होगा तभी कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति देश लौटकर काम करने के लिए प्रेरित होगा. अमेरिका पिछले 50 सालों से भारतीयों को आकर्षित करता आया है क्योंकि उसने उनकी क्षमताओं के लिए एक इकोसिस्टम बनाया है और भारत को भी वही करना होगा.
दरअसल भारत के लिए असली चुनौती सिर्फ अपने लोगों को वापस बुलाना नहीं है बल्कि ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें उन्हें वापस आने की जरूरत ही न पड़े. अगर देश रोजगार रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में स्थिरता और स्वतंत्रता दे सके तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय प्रतिभा विदेशों की लैब्स और दफ्तरों से निकलकर अपने ही देश की तरक्की में जुट जाएगी.
भारत के पास मौका है सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम इस मौके का सही इस्तेमाल कर पाएंगे.